सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ / सुदामा-चरित रचना में कवि ने उनकी इसी आदर्श मैत्री का वर्णन किया है। यह कथा सुख, सम्पत्ति और वैभव प्रदान करने वाली है। इससे सुन्दर उपदेश प्राप्त होता है। विशेष—इस दोहे में कवि ने श्रीकृष्ण और सुदामा की आदर्श-मैत्री और उसके महत्त्व की ओर इंगित किया है। (४) शब्दार्थ—विप्र = ब्राह्मण। धाम = घर, निवास-स्थान। हिये = हृदय। हरि = श्रीकृष्ण। व्याख्या—श्रीकृष्ण जी के मित्र सुदामा नामक ब्राह्मण सदैव अपने घर पर ही रहते और भिक्षा माँगकर अपने जीवन का निर्वाह करते थे। वे श्रीकृष्णजी के अनन्य भक्त थे और हृदय में उन्हीं का दिन-रात नाम जपते थे। विशेष—इस दोहे में प्राचीन ब्राह्मण धर्म का निरूपण हुआ है, जिसके अनु- सार ब्राह्मण के दो ही धर्म थे—भिक्षावृत्ति से निर्वाह करना और दिन-रात प्रभु का भजन करना। (५) शब्दार्थ—घरनी = घरवाली, पत्नी, स्त्री। गहे = ग्रहण किये। वेद की रीति = वैदिक आचार-विचार, नियम, वेदों में स्त्रियों के जो धर्म कहे गये हैं। सलज = लज्जायुक्त। सुबुद्धि = अच्छी बुद्धि वाली। व्याख्या—सुदामा की धर्म पत्नी पतिव्रता थी, वह वेद-शास्त्रों में प्रतिपादित नारी-धर्म का पालन करने वाली, लज्जाशील, सदाचारमयी और अच्छी बुद्धि वाली थी। पति-सेवा से उसका विशेष लगाव था। उसमें वह अत्यधिक रुचि रखती थी। विशेष—इस दोहे में सुदामा-पत्नी सुबुद्धि के चारित्रिक वैशिष्ट्य का उद्- घाटन हुआ है। (६) शब्दार्थ—कह्यौ = कहा। तिय = स्त्री, पत्नी। कृस्न = श्रीकृष्ण। व्याख्या—सुदामा ने एक दिन अपनी पत्नी सुबुद्धि से कहा कि द्वारिकापति श्रीकृष्ण उसके बाल-सखा हैं। इस रहस्य से परिचित हो जाने के पश्चात् सुबुद्धि समय-समय पर इस प्रकार के अनुपम उपदेश दिया करती थी। वह अपने उपदेशों से अपने पति को श्रीकृष्ण के पास जाकर अपनी निर्धनता को समाप्त कराने की प्रेरणा दिया करती थी।