भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

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सुगम चिकित्सा

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जो पुरुषों को दी जाती है देना चाहिए। और योनि-स्थान में पिच्छकारी देनी चाहिए। तथा जबतक आराम न हो पूरा विश्राम करना चाहिए, गर्म जल में बैठना भी फायदेमन्द है।

यह बड़ी धिनोनी बीमारी है। यह इस रोग के रोगी स्त्री-पुरुष के साथ सहवास करने से लग जाती है। यदि माता की बीमारी हुई और उसके गर्भ रह गया तो गर्भ में ही बालक को गर्मी भी वह बीमारी लग जाती है। यह रोग भी छूत से लग जाता है। अतः थोमास का हुस्का, कपड़े, विछौना इस्तैमाल न करना चाहिए।

सबसे पहले अण्डकोषों में या इन्द्री की सुपारी पर एक छोटी-सी फुन्सी उठती है। यह लक्षण सहवास के पाँच-छः दिन बाद होता है। इसके छः-सात हफ्ते बाद खसरे-खसरे जैसे दाने सारे शरीर पर निकल आते हैं। सिर दर्द, मितली होती है, भूख बन्द हो जाती है। गला बैठ जाता है। बगल और गुदा के आस-पास चेपवाले घाव दीख पड़ते हैं। बाल भड़ने लगते हैं।

महीनों और वरसों रोग के गुजर जाने पर रोग की तीसरी अवस्था आती है, जब बड़े गहरे घाव शरीर के भिन्न-भिन्न भागों में निकलते हैं। नाक सड़ जाती है, और गिर पड़ती है। नाक की जगह सिर्फ छेद रह जाता है। खोपड़ी की हड्डी गल जाती है। अङ्ग की, और कर्हा की भी हड्डी गल सकती है। कभी-कभी इन्द्रिय गल-सड़ कर गिर जाती है।

रोग हुआ है, यह मालूम होते ही भट्ट-पट इलाज कर लेना