भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

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दिन और रात के काम

है, क्योंकि वह पेट में २-३ घन्टे पड़ा रहता है। रसोई घर साफ-सुथरा रहना चाहिए और वर्तन भी। वहाँ सील न रहनी चाहिए, न अँवैरा रहना चाहिए। हवा आवे और धुआँ निकलने को उसमें काफी खिडकियाँ रहनी जरूरी हैं। कूड़े-कचरे के लिए ढ़कनेदार कनस्तर या कोई वर्तन रक्खा जाय। नालियाँ पकी हों। खाना जालीदार आलमारी में रक्खा जाय जिससे मक्खी, मच्छर उस पर न बैठ सकें। चूहे, मक्खी, चीड़टी, मींगुर, और दूसरे चिन्तने कीड़े बहुत मैले होते हैं, उनके पैरों में हजारी भयानक रोगों के जन्तु चिमटे रहते हैं, जब वे भोजन पर बैठते हैं तो गन्दगी भोजन में छोड़ देते हैं। इसलिए इनसे भोजन को बिल्कुल बचाना चाहिए। चावल, दाल, तरकारी को खूब साफ पानी में धोना चाहिए और वर्तन खूब साफ करके तब खाना पकाना चाहिए। पका हुआ खाना गरम रहते खा लिया जाय। बासी खाना बहुत-सी बीमारियों की जड़ है।

खाना खाने की जगह उजालेदार और साफ-सुथरी रहे। खाना खाने के समय खूब प्रसन्न रहना तथा धीरे-धीरे चबाकर खाना चाहिए। भोजन का समय दोपहर और शाम को नियत कर लेना जरूरी है। रात को सोने से ३ घण्टा पहले खाना जरूर खा लेना चाहिए। चड़े आदमी को २४ घण्टे में दो बार और बच्चों की तीन बार खाना काफी है। जबतक पहला खाया भोजन पच न जाय दुबारा नहीं खाना चाहिए। भोजन के बाद थोड़ा दहलना और विश्राम करना चाहिए।