सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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चारपाई, चटाई या तख्त पर चित्त लिटाओ। साधारण सफाई के लिए मामूली गरम पानी ही काफी हैं। पर पूंछ में दर्द हो तो पानी जरा तेज कर लेना चाहिए। बीमार से गन्ध-भर ऊँचाई पर दीवार में कील ठोककर बरतन को टाँग दी और नली को घी से चिकना करके योनि में डाल दो—पानी आने दो। मासिक-धर्म रुक-रुक कर आता हो तो दो-तीन बार दिन-भर में करना चाहिए। सकेदी की बीमारी में जरा-सी गुलाबी फटकरी पानी में मिलाकर पिचकारी देनी चाहिए।
कोठा साफ करने के लिए यही पिचकारी गुदा में लगाई जा सकती है। इसके लिए रोगी को दाहिनी करवट लिटाओ, दाहिना पैर सिकोड़ दो, बाँया फैला दो और धीरे से नली गुदा में जरा सीधी लगाकर प्रवेश कर दो। इस काम के लिए दो या डेढ़ सेर पानी होना चाहिए। सादा पानी से भी काम चल सकता है। पर पेट में भारी दर्द हो, पेट सरल हो, शुद्ध पड़ गये हों तो पानी में एक चम्मच नमक और जरा-सा साबुन नहाने का घोल दो। योनी और गुदा के काम की अलग-अलग नालियाँ बाजार में अंग्रेजी दवावालों के यहाँ मिलती हैं। इसे २। इच्छ गुदा में भीतर जाने दो। पिचकारी देने पर जब थोड़ा पानी रह जाय तब नली निकाल लो—टूटी जाने की इच्छा को जरा देर रोको और रोगी के पेट को हाथ से दबाओ। बच्चों को भी इससे लाभ होगा, पर नली छोटी होनी चाहिए। ( देखो चित्र नं० ५ )
साफ वीतल में गरम पानी भरकर खूब कसकर डांट दो और