भारतकोश
सुगम चिकित्सा

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

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पेट की बीमारियाँ

इसे जलन्धर भी कहते हैं, इसकी तीन किस्म है। एक वह जिसमें जोड़ों में सूजन आजाती है। इसकी उत्पत्ति क्लेजे की खराबी से होती है; दूसरा जलोद्बर वाः जिसमें पेट बढ़ जाता है और चमड़ी भारी हो जाती है। पेट पानी से भरी हुई मशक की भाँति नन जाता है, नाभि का गढ़ा भर जाता है, पेट पर उँगली से ठोकने पर तबले के समान आवाज निकलती है ; तीसरा वालोद्बर जिसमें पेट कड़ा हो जाता है तथा दस्त-पेशाब का बन्द लग जाता है।

इस रोग में पानी पीने को नहीं देना चाहिए। ऊँटनी का दूध ही पिलाना चाहिए, या साँक और मकोथ की पोटली पानी में उबालकर वह पानी देना चाहिए। सूरज की ओर पीठकर धूप में बैठावे। रोगी को सहते हुए गर्म बालू रेत में छाती तक दबा दे। और जितनी देर मुमकिन हो दबाये रखे। तेज जुलाब दे।

१—एक छटाँक खिले हुए चने का बेसन लेकर उसपर थूहर