सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)

सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)
Sukhmani Sahib with Complete 24 Ashtapadis Commentary
श्री गुरु अर्जुन देव जी (पञ्चम पातशाह) द्वारा
DevanagariHindipublished131 पृष्ठ
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46 इंद्री जित पंच दोख ते रहत ॥ नानक कोटि मधे को ऐसा अपरसि ॥१॥ बैसनो सो जिसु ऊपरि सुप्रसन्न ॥ बिसन की माइआ ते होइ भिन्न ॥ करम करत होवै निहकरम ॥ तिसु बैसनो का निरमल धरम ॥ काहू फल की इछा नही बाछै ॥ केवल भगति कीरतन संगि राचै ॥ मन तन अंतरि सिमरन गोपाल ॥ सभ ऊपरि होवत किरपाल ॥ आपि दृढ़ै अवरह नामु जपावै ॥ नानक एहु बैसनो परम गति पावै ॥२॥ भगउती भगवंत भगति का रंगु ॥ सगल तिआगै दुस्ट का संगु ॥ मन ते बिनसै सगला भरमु ॥ करि पूजै सगल पारब्रहमु ॥