भारतकोश
सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)

सुखमनी साहिब (श्री गुरु अर्जुन देव जी - सम्पूर्ण २४ अष्टपदी सटीक)

Sukhmani Sahib with Complete 24 Ashtapadis Commentary

श्री गुरु अर्जुन देव जी (पञ्चम पातशाह) द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

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53 नानक जिसु जिसु भावै तिसु तिसु निसतारै ॥३॥ कई कोटि राजस तामस सातक ॥ कई कोटि बेद पुरान सिमृति अरु सासत ॥ कई कोटि कीड़े रतन समुद ॥ कई कोटि नाना प्रकार जंत ॥ कई कोटि कीड़े चिर जीवे ॥ कई कोटि गिरी मेर सुवरन थीवे ॥ कई कोटि जख्य किन्नर पिसाच ॥ कई कोटि भूत प्रेत सूकर मृगाच ॥ सभ ते नेरै सभहू ते दूरि ॥ नानक आपि अलिपतु रहिआ भरपूरि ॥४॥ कई कोटि पाताल के वासी ॥ कई कोटि नरक सुरग निवासी ॥ कई कोटि जनमहि जीवहि मरहि ॥ कई कोटि बहु जोनी फिरहि ॥

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