भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

॥ चानक को अंग ॥ [ ६७ होइ उदास बिचार बिना नर, गेह तज्यौ बन जाइ रह्यौ है । अंबर छाडि बघंबर लै करि, कै तप कौ तन कष्ट सह्यौ है ॥ आसन मारि शवासन ह्वै, मुख मौन गही, मन तौ न गह्यो है । सुन्दर कौन कुबुद्धि लगी कहि, या भवसागर माँहि बह्यौ है ॥१९॥ भेष धर्यौ पर भेद न जानत, भेद लहे बिनु खेद ही पैहै । भूख हा मारत नीद निवारत, अन तजै फल पत्रनि खैहै ॥ और उपाइ अनेक करै पुनि, ताहि तै हाथ कछू नहीं ऐहै । या नर देह वृथा शठ खोवत, सुन्दर राम बिना पछितैहै ॥२०॥ आपुने आपुने थान मुकाम, सराहन कौ सब बात भली है । यज्ञ ब्रतादिक तीरथ दान, पुरान कथा जु अनेक चली है ॥ केतिक और उपाइ जहा लग, ते सुनि कै नर बुद्धि छली है ।