भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 112

॥ वचन विवेक को अंग ॥ [ १०३ काहू के कुरूप कारौ कूबरौ व्है अंगहीन, वाकी और देखि देखि माथौ ई हलाइये । सुन्दर कहत वाके बाप ही कौ प्यारौ लागे, यौ ही जानि बानी कौ विवेक ऐसैं पाइये ॥३॥ बोलिये तौ तब जब बोलिबे की सुधि होइ, न तौ मुख मौन गहि चुप होइ रहिये । जोरिये ऊ तब जब जोरिबो ऊ जानि परै, तुक छंद अरथ अनूप जामैं लहिये ॥ गाइये ऊ तब जब गाइवे कौ कंठ होइ, श्रवन के सुनत ही मन जाइ गहिये । तुक भग छंद भग अरथ मिले न कछु, सुन्दर कहत ऐसी वानी नही कहिये ॥४॥ एकनि के बचन सुनत अति सुख होइ, फूल से झरत है अधिक मन भावने । एकनि के बचन अश्म मानौ वरषत, श्रवन के सुनत लगत अलखावने ॥ एकनि के वचन कटक कटु बिष रूप, करत मरम छेद दुख उपजावने । सुन्दर कहत घट घट मैं वचन भेद, उत्तम मधिम और अधम सुनावने ॥५॥