सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
पृष्ठ 135, कुल 284 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ ओट नहि राखै कछु लोट पोट होइ जाइ, चोट नहिं चूकै, शीश रिपु कौ उतारि है । सुन्दर कहत ताहि नैकहू न सोच पोच, ऐसौ शूरवीर धीर मीर जाइ मारि है ॥५॥ अधिक अजानबाहु मन मैं उछाह कीये, दीये गजगाह मुख बरखत नूर है । काढै जब करवाल वाल सब ठाढे होहिं, अति बिकराल पुनि देखत करूर है ॥ नैक न उसास लेत फौज कौं फिटाइ देत, खेत नहिं छाडै मारि करै चकचूर है । सुन्दर कहत ताकी कीरति प्रसिद्ध होइ, सोई शूरबीर धीर श्याम के हजूर है ॥६॥ ज्ञान कौ कवच अग काहू सौं न होइ भग, टोप शीस झलकत - परम बिबेक है । तिन्है ताजी असवार लीये समसेर सार, आगे ही कौ पाव धरै भागणै की टेक है ॥ छूटत बदूक बाण बीचै जहा घमसान, - देखिकै पिशुन दल मारत अनेक है । सुन्दर सकल लोक माहि ताकौ जै जै कार, ऐसौ शूरबीर कोऊ कोटिन मैं एक है ॥७॥ (६) अजानबाहु-अजानवाहु-दीर्घबाहु, शूरवीर । कर- वाल-तलवार ।