भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

१३० ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ साधु को अंग ॥२०॥ इन्दव छंद प्रीति प्रचंड लगै परब्रह्म हि, और सबै कछु लागत फीको । शुद्ध हृदै मति होइ सु निर्मल, द्वैत प्रभाव मिटै सब जी कौ ॥ गोष्ठि रु ज्ञान अनत चलै जह, सुन्दर जैसे प्रवाह नदी कौ । ताहि तं जानि करौ निसवासर, साधु कौ सग सदा अति नीकौ ॥१॥ जौ कोऊ जाइ मिलै उनसौ नर, होत पवित्र लगै हरि रंगा । दोष कलंक सबै मिटि जात सु, नीचहू आइकैं होत उतगा ॥ ज्यौं जल और मलीन महा अति, गंग मिले होइ जात है गंगा । सुन्दर शुद्ध करै ततकाल सु, है जग मांहि बडी सतसंगा ॥२॥ (१) द्वैत-भेदभाव । (२) उतगा-उत्तम, ऊचा ।