भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ मनहर छंद । ॅशत्रु है न मित्र कोऊ जाकै सब है समांन, देह कौ ममत्व छाडि आतमा ही राम है । और हू उपाधि जाकै कब हूँ न देषियत, सुख के समुद्र मे रहत आठो जाम है ॥ रिद्धि अरु सिद्धि जाकै हाथ जोरि आगै खरी, सुन्दर कहत ताकै सब ही गुलाम हैं । अधिक प्रशंसा हम कसै करि कहि सकै, ऐसै गुरुदेवकौ हमारी जु प्रणांम है ॥११॥ झांन कौ प्रकास जाकै अन्धकार भयौ नास, देह अभिमान जिन तज्यौ जानि सारधी । सोई सखसागर उजागर बैरागर ज्यौ, जाकै बैन सुनत बिलात है बिकारधी ॥ अगम अगाध अति कोऊ नहि जानै गति, आतमा कौ अनुभव अधिक अपारधी । ऐसौ गुरुदेव वदनीक तिहुँ लोक माहि, सुन्दर विराजमान शोभत उदारधी ॥१२॥ (११) ममत्व-ममता, आसक्ति । उपाधि-लागलपेट । आठों जाम-आठो पहर । (१२) सारधी-सारतत्व । बैन- वचन उपदेश । विकार धी-विकृत विचार । बिलात है-नष्ट हो जाते हैं । वदनीक-वदनीय । वैरागर-हीरा