भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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१४८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ विपर्यय शब्द को अंग ॥२२॥ सवैया छंद श्रवनहु देखि सुनै पुनि नैनहुं, जिव्हा सूंधि नासिका बोल । गुदा खाइ इन्द्रिय जल पीवै, बिनही हाथ सुमेर हि तोल ॥ ऊंचे पाइ मूड नीचे कौ, बिचरत तीनि लोक मैं डोल । सुन्दरदास कहै सुनि ज्ञानी, भलीभाति या अर्थ हि खोल ॥१॥ अंधा तीनि लक कौ देखै, बहिरा सुनै बहुत बिधि नाद । नकटा बास कमल की लेवै, गूंगा करै बहुत सबाद ॥ टूटा पकरि उठावै पर्वत, पगुल करै नृत्य अहलाद । जो कोऊ याकौ अर्थ बिचारै, सुन्दर सोई पावै स्वाद ॥२॥ कुंजर कौ कीरी गिलि बैठी, सिंघ हि खाइ अघानौ श्याल ।