भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

१५४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ सुन्दर धूप माहिं शीतलता, जलत रहै जे बैठे छाहि ॥१६॥ माइ बाप तजि धी उमदानी, हरषत चली खसम के पास । बहू विचारी बड बखतावरि, जाके कहे चलत है सास ॥ भाई खरौ भलौ हितकारी, सबै कुटुम्ब कौ कोयो नास । ऐसी बिधि घर बस्यौ हमारौ, कहि समुझावै सुन्दरदास ॥१७॥ परधन हरै करै पर निंदा, पर धी कौ राखै घर माहि । मास खाइ मदिरा पुनि पीवै, ताहि मुक्ति कौ संशय नाहिं ॥ अकर्म ग्रहै कर्म सब त्यागै, ताकी संगति पाप नसाहिं । ऐसी करै सु सत कहावै, सुन्दर और उपजि मरि जाहिं ॥१८॥ बढई चरखा भलौ सवार्यौ, फिरनै लाग्यौ नीकी भाति । बहू सास कौ कहि समुझावै, पूनी घटै दिवस नहिं राति ।