भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 168

॥ विपर्यय शब्द को अंग ॥ [ १५६ सुक के वचन अमृतमय ऐसे, कोकिल धार रहे मन माहिं । सारी सुनै भागवत कबहौ, सारस तीऊ पावै नाहि ॥ हंस चुगै मुक्ताफल अर्थहिं, सुन्दर मानसरोवर न्हाहि । काक कवीश्वर विपई जेते, ते सब दौरि करक हि जाहि ॥३०॥ नष्ट होहिं द्विज भ्रष्ट क्रिया करि, कष्ट किये नहि पावै ठौर । महिमा सकल गई तिनि केरी, रहत पगन तर सब सिरमौर ॥ जित तित फिरहि नही कछु आदर, तिनको कोउन घालै कौर । सुन्दरदास कहै समुझावै, ऐसी कोउ करौ मति घोर ॥३१॥ सास्त्र वेद पुरान पढै किनि, पूनि व्याकरन पढै जे जोर । नाना तर्क सु पढ लखै त्रि, सूत्र पद जानि विचारै नोर ॥