भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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॥ गुरुदेव को अग ॥ [ ९ गुरु के प्रसाद शून्य मैं समाधि लागे । सुन्दर कहत गुरुदेव जो कृपालु होहि, तिनके प्रसाद तत्व ज्ञान पुनि पाइये ॥१७॥ बूडत भी सागर मैं आडके बंधावै धीर, पारऊ लगाइ देत नाय कों ज्या खेवसी । पर उपकारी सब जीवनि के सारै काज, कबहू न आवै जाके गुननि कौ छेव सौ ॥ बचन सुनाइ भय भ्रम सब दूरि करै, सुन्दर दिखाइ देत अनप अभेव सौ । और हू सनेही हम नीके करि देखे सोधि, जग में न कोऊ हितकारी गुरुदेव सौ ॥१८॥ गुरु तात गुरु मात गुरु बंधु निज गात, गुरुदेव सब सिष्य सकल सवाऱ्यो है । गुरु दिये दिव्य नैन गुरु दिये मुख वैन, गुरुदेव श्रवन दे सब्द हू उचाऱ्यो है ॥ गुरु दिये हाथ पाव गुरु दियो सीस भाव, (१७) प्रसाद-कृपा । उत्तम दशा-शुद्ध अवस्था । भवदुख-संसार के दुख । शून्य मे-निरंजन निराकार ब्रह्म मे । (१८) बूडत-डूबते हुओ को । भी-भव । खेव सौ-खेने वाला । छेवै-पार । सोधि-परीक्षा करके ।