सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ ] ।। सुन्दर विलास ।। सुरेसुरानद हू कै आनद अच्छेव जू ॥ रैदास कबीरदास मोभादास पीपादास, धनादास हू कै दासभाव ही की टेव जू । सुन्दर सकल सत प्रगट जगत मांहि, तै से गुरु दादूदेव लागे हरि सेव जू ॥२४॥ गुरुदेव सर्वोपरि अधिक विराजमान, गुरुदेव सब ही तै अधिक गरिष्ठ है । गुरुदेव दत्तात्रेय नारद शुकादि मुनि, गुरुदेव ज्ञानघन प्रगट वसिष्ठ हैं ॥ गुरुदेव परम आनदमय देखियत, गुरुदेव वर वरीयान हू वरिष्ठ है । सुन्दर कहत कछु महिमा कही न जाइ, ऐसे गुरुदेव दादू मेरे सिर इष्ट है ॥२५॥ जोगी जैन जंगम सन्यासी वनवासी बौद्ध, और कोऊ भेष पक्ष सब भ्रम भान्यो है । तापस रिषीसुर मुनीसुर कवीसुर ऊ, : सबन को मत देखि तत पहिचान्यो है ॥ वेदसार तंत्रसार स्मृति रु पुरान सार, ग्रन्थन को सार सोई हृदै माँहि आन्यो है, (२५) गरिष्ठ-महान् । वरिष्ठ-श्रेष्ठ । इष्ट-आराध्य देव । सिर-सर्वोपरि ।