सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ आतम अनुभव को अंग ॥ [ २१३ इन्द्रव छंद श्रोत्र न जानत चक्षु न जानत, जानत नाहि जु सूघत घ्रानै । ताहि सपर्श त्वचा न सकै पुनि, जांनन नाहि न जीभ बखानै ॥ ना मन जानत बुद्धि न जानत, चित्त अह कहि क्यों पहिचानै । शब्द हु सुन्दर जानि सकै नहिं, आतमा आपुकौ आपु ही जानै ॥१०॥ सूर के तेज तैं सूरज दीसत, चंद के तेज तैं चंद उजासै । तारे के तेज तैं तारे उ दीसत, वीजुरि तेज तै विज्जु चकासै ॥ दीप के तेज तै दीपक दीसत, हीरे के तेज तैं हीरो ऊ भासै । तैसे ही सुन्दर आतम जानहु, आपु के तेजतैं आपु प्रकासै ॥११॥ कोउ कहै यह सृष्टि सुभाव ते, कोउ कहै यह कर्म तै सृष्टी । कोउ कहै यह काल उपावत, कोउ कहै यह ईश्वर तिष्टी ॥