सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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१४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ अथ उपदेश चितावनी को अग ॥२॥ हमाल छंद तो सही चतुर तू जान परवीन अति, परै जनि पिंजरै मोह कूंवा । पाइ उत्तम जनम लाइ लै चपल मत, गाड गोविंद गुन जीति जूवा ॥ आपु ही आपु अज्ञान नलनी बध्यौ, विना प्रभु विमुख कै वार मूवा । दास सुन्दर कहै परम पद तौ लहै, राम हरि राम हरि बोल सूवा ॥१॥ नप्स शतान कौ आपुनौ कैद करि, क्या दुनी मै पर्या खाइ गोता । है गुनहगार भी गुनह ही करत है, खाइगा मार तब फिरै रोता ॥ जिन तुझै खाक सौ अजब पैदा किया, तू उस्से क्यों फरामोस होता । दास सुन्दर कहै सरम तब ही रहै, हक्क तू हक्क तू बोल तोता ॥२॥ (१) परवीन-प्रवीण । अज्ञान नलनी-अज्ञानकी नाली, जैसा कि तोता नाली के द्वारा पकड़ा जाता है । (२) नप्स मन । उस्से-उसमे । फरामोस-विमुख ।