सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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२२८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ आदि हु अति हु मधि हु ब्रह्म हि, है सब ब्रह्म इहै मति ठानी। सुन्दर ज्ञेय रु ज्ञान हु ब्रह्म हि, आपु हु ब्रह्म हि जानत ज्ञानी ॥७॥ ऊठत केवल बैठत केवल, बोलत केवल बात कही है। जागत केवल सोवत केवल, जोवत केवल दृष्टि लही है ॥ भूत हु केवल भावि हु केवल, बर्तत केवल ब्रह्म सही है। है सब ही अध ऊरध केवल, सुन्दर केवल ज्ञान वही ९ ॥८॥ केवल ज्ञान भयौ जिनकै उर, ते अध ऊरध लोक न जाही। व्यापक ब्रह्म अखंड निरन्तर, वा बिन और कहू कछु नाही ॥ ज्यौ घट नाश भये घटव्योम सु, लीन भयौ पुनि है नभ माही ' त्यौ मुनि मुक्ति जहा वपु छाडत, सुन्दर मोक्ष शिला कहु काही ॥६॥ (९) वपु-शरीर । मोक्षशिला-जैन धर्म मे प्रसिद्ध उच्च अवस्था ।