सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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२४२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ इन्दव छंद कै यह देह धरौ वन पर्वत, कै यह देह नदी मैं वहौ जू । कै यह देह धरौ धरती महि, कै यह देह कृसान दहौ जू ॥ कै यह देह निरादर निंदहु, कै यह देह सराहि कहौ जू । सुन्दर सशय दूरि भयौ सब, कै यह देह चलौ कि रहौ जू ॥ ३ ॥ कै यह देह सदा सदा सुख सम्पति, कै यह देह विपत्ति परौ जू । कै यह देह निरोग रहौ नित, कै यह देह हि रोग चरौ जू ॥ कै यह देह हुताशन पैठहु, कै यह देह हिमारै गरौ जू । सुन्दर सशय दूरि भयौ सब, कै यह देह जिवौ कि मरौ जू ॥४॥ ॥ इति निः सशय ज्ञान को अङ्ग सम्पूर्ण ॥ (३) कृसान-कृशानु, अग्नि। (४) हुताशन-अग्नि। हिमारै-हिमालय ।