भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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पृष्ठ 254

॥ प्रेमपरायण ज्ञान को अंग ॥ [२४५ लक्ष अलक्ष न दक्ष अदक्ष न, पक्ष अपक्ष न तूल न भारो । झूठ न साच अवाच न वाच न, कंचन काच न दीन उदारो ॥ जान अजान न मान अमान न, ज्ञान गुमान न जीत न हारो । सुन्दर कोउ न जानि सकै यह, गौकुल गाव की पैंढो ही न्यारी ॥५॥ ५ इति प्रेमपरायण ज्ञान को अंग सम्पूर्ण ॥ (५) लक्ष-लक्ष्य । अलक्ष-अलक्ष्य । दक्ष-निपुण, चतुर, कुशल । तूल-हल्का । अवाच-अवाच्य, अवर्णनीय । वाच- वाच्य, वर्णनीय । दीन-गरीब । उदार-दानी ।