भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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पृष्ठ 256

॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २४७ दीसन भित्त तयो भ्रम दर्पन, वस्तु दिषावन एकई सो है ॥ जो सुनिये गन दृष्टि परे पुनि, वा बिन ओर नहीं अब को है । सुन्दर सुन्दर व्यापि रह्यो सब, सुन्दर ही महि सुन्दर सो है ॥३। ज्यों बन एक अनेक भये द्रुम, नाम अनंतनि जाति हु न्यारी । वापि तडाग रु कूप नदी सब, है जल एक सो देषौ निहारी ॥ पावक एक प्रकास बहू विधि, दीप चिराफ़ मसाल हु वारी । सुन्दर ब्रह्म विलास अखंडित, पंडित भेद की बुद्धि सु टारी ॥४॥ एक शरीर मैं अंग भये बहु, एक धरा पर धाम अनेका । एक शिला महिं कोरि किये सब, चित्र बनाइ घरे ठिकठेका ॥ एक समुद्र तरंग अनेकनि, कैसे के कीजिये भिन्न विवेका । द्वैत कछू नहिं देखिये सुन्दर, ब्रह्म अखंडित एक की एका ॥५॥