भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

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२६८ करके आन्तरिक ध्वनिया का सुनना या अनासक्त उदासीन भाव से सब सुनना या सब व्यवहार करना । नकटा वास कमल की लेवे-लोकसज्जा छोड कर भगवत् प्रेम का आनन्द लेना । गूगा करे बहुत सवाद-सासारिक चर्चाओ मे मौन रहकर ब्रह्मचर्चा मे लीन रहना । टू टा पकरि उठावै पर्वत-सब व्यवहार करता हुआ भी निष्क्रिय होना, कर्तृत्वाभिमान से दूर रहना । पगुल करे नृत्य आल्हाद-निष्काम होकर सतोष का आनन्द लेना । अथवा परमेश्वर हमारी तरह चर्मचक्षु न होने पर भी तीनो लोको का द्रष्टा है । चर्म श्रोत्रेन्द्रिय न होने पर भी सब सुन रहा है । चर्मनासिका न होने पर भी हमारे हृदयकमल के पवित्रभावो की सुगध ले रहा है । चर्म जिव्हा न होने पर भी हमारे हृदय मे बोल रहा है या हमें बुलवा रहा है । निष्क्रिय होकर भी सारे विश्व के पालन पोषण का भार उठा रहा है निष्काम होकर भी सब लीला कर रहा है । यथा—'पश्यत्यक्षु स शृणोत्यकर्ण.’ इत्यादि । (३) कु जरको कीरी गिल बैठी-सूक्ष्म विवेक विचार बुद्धि से कामादि वासनाओ को जीतना । सिंघ हि पाइ अघानो श्याल-सियार जैसे अल्पप्राण जीव का भी आत्म- ज्ञान के बल पर अज्ञान को जीतना । मछरी अग्नि माहि सुख पायो-जीव का ब्रह्मज्ञान की अग्नि मे सुख पाना ।