भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 29

२० ] ।। सुन्दर विलास ।। घरी घरी घटत छीजत जात छिन छिन, भीजत ही गरि जात माटी कौ सौ ढेल है । मुक्ति हू कै द्वारे आइ सावधान क्यों न होई, वार वार चढत न “त्रिया कौ सौ तेल है” ॥ करि लै सुकृत हरि भजन अखड उर, याही मैं अन्तर परै यामैं ब्रह्म मेल है । मनुष जन्म पाउ जीति भावै हारि अब, सुन्दर कहत यामैं जूवा कौ सौ खेल है ॥१३॥ जोवन कौ गयौ राज और सब भयौ साज, आपुनि दुहाई फेरि दामामौ वजायौ है । लकुटी हथियार लिये नैनन की ढाल दीये, सेत वार भये ताकौ तंबू सौ तनायौ है ॥ दशन गये सु मानौ, दरवान दूरि कीये, झींगरी परी सु औरै बिछौना बिछायौ है । सीस कर कंपत सु सुन्दर निकार्यौ रिपु, देषत ही देषत बुढापौ दौरि आयौ है ॥१४॥ (१३) सुकृत-सत्कर्म । और-भेद, दूरी । भावै-चाहे । (१४) सेतवार-सफेद बाल । दशन, दात । झींगरी परी-चमड़ी सिकुड़ गई ।