सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ काल चितावनी को अंग ॥ [ ३१ अथ काल चितावनी को अंग ॥२॥ इन्दव छन्द मन्दिर माल विलाइत है, गज ऊट दमामे दिना इक दो है । तातहु मात त्रिया सुत बधव, देषि धौ पामर होत बिछोहै ॥ झूठ प्रपंच सौ गचि रह्यौ शठ, काठ की पूतरि ज्यौ कपि मो है । मेरि ही मेरि करै नित सुन्दर, आँखि लगै कहि कौनको को है ॥१॥ ये मेरे देश बिलाइत है गज, ये मेरे मन्दिर या मेरी थाती । ये मेरे मात पिता पुनि बधव, ये मेरे पूत सु ये मेरे नाती ॥ ये मेरी काँमनि केलि करै नित, ये मेरे सेवक है दिन राती । सुन्दर वैसे हि छाडि गयौ सब, तेल जर्र्यौ रु बुझी जब बाती ॥२॥ तैं दिन च्यारि बिराम लियौ शठ, तेरै कहै कछू व्है गई तेरी । जैसे हि बाप दादा गये छाडि सु, तैसेही तू तजि है पल फेरी ॥