भारतकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

॥ अधीरज उराहने को अग ॥ [ ६१ मनहर छंद काहे कौ काहू कै आगै जाइ कै अधीन होइ, दीन दीन बचन उचार मुख कहते । जिनकै तौ मद अरु गरब गुमान अति, तिनकै कठोर बैन कबहु न सहते ॥ तुम्हारे ही भजन सौं अधिक लै लीन श्रति, सकल कौ त्यागि कै इकंत जाइ गहते । सुन्दर कहत यह तुमही लगायौ पाप, पेट न हुतौ तौ प्रभु बैठे हम रहते ॥११॥ पेट ही कै बसि रक पेट ही कै बसि राव, पेट ही कै बसि और खान सुलतान है । पेट ही कै बसि योगी जगम सन्यासी सेख, पेट ही कै बसि बनवासी खात पान है ॥ पेट ही कै बसि रिषि मुनि तपधारी सब, पेट ही कै बसि सिद्ध साधक सुजान है । सुन्दर कहत नही काहू कौ गुमाँन रहै, पेट ही कै बसि प्रभु सकल जिहान है ॥१२॥ ॥ इति अधीरज उराहने को अंग सम्पूर्ण ॥ (१२) जिहान-ससार ।