सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥ घेरिये तौ घेर्यौ हू न आवत है मेरौ पूत, ' जोई परमौधिये मु कान न धरतु है । नीति न अनीति देखै शुभ न अशुभ पेखै, पल ही मैं होती अनहोती हु करतु है ॥ गुरुकी न साधू की न लोक वेद हू की शक, काहू की न मानै न तौ काहू तै डरतु है । सुन्दर कहत ताहि धीजिये सु कौन भांति, मन कौ सुभाव कछु कह्यौ न परतु है ॥३॥ काम जब जागै तब गनत न कोऊ साख, जानै सब जेई करि देखत न माधी है । क्रोध जब जागै तब नेकु न सभारि सकै, ऐसी बिधि मूल की अविद्या जिन साधी है ॥ लोभ जब जागै तब त्रिपत न क्यौही होइ, सुन्दर कहत इति ऐसे ही मै खाधी है । मोह मतवारौ निश-दिन हि फिरत रहै, मन सौ न कोऊ हम देख्यौ अपराधी है ॥४॥ देखिवे कौ दौरै तौ अटकि जाइ वाही ओर, सुनिवे कौ दौरै तौ रसिक सिरताज है । सूँघवे कौ दौरै तौ अघाइ न सुगध करि, खाइवे कौ दौरै तौ न धाप महाराज है ॥ (४) साख-रिश्ता, सबन्ध । माधी-पाप बुद्धि ।