सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ मन को अंग ॥ [ ८५ कबहूंक साध होत कबहूक चोर होत, कबहूक राजा होत कबहूक रक सौ । कबहूक दीन होत कबहू गुमानी ह त, कबहूंक सूधौ होत कबहूंक बक सौ ॥ कबहूक कामी होत कबहूक जती होत, कबहूंक निर्मल होत कबहूंक पक सौ । मन कौ स्वरुप ऐसौ सुन्दर फटिक जैसौ, कबहूक सूर होत कबहूं मयक सौ ॥१६॥ हाथीकौ सौ कान किधौ पीपर कौ पान किधौ, ध्वजा कौ उडान कहु थिर न रहतु है । पानी कौ सौ घेरि किधौ पौन उग्झेर किधौ, चक्र कौ सौ फेरि कोऊ कैसे कै गहतु है ॥ अरहट माल किधौ चरखा कौ ख्याल किधौ, फेरि खात वाल कछु सुधि न लहतु है । घूमकौ सौ घाव ताकौ राखिबे कौ चाव ऐसौ, मन कौ सुभाव सु तौ सुन्दर कहतु है ॥२०॥ (१६) गुमानी-अभिमानी, घमंडी । जती-साधु । पक- कीचड । सूर-सूर्य सा गर्म । मयक-चद्रमा सा ठंडा । (२०) घेर-चक्कर, भंवर । पौन उरझेर-हवा का चक्कर, भभूला । घूम को घाव-धुआ उडान ।