भारतकोश
सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)

Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary

कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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७ पञ्चमः सर्गः ४९ प्राचेतसीं प्राप्य दिशं प्रचेताः पाश्चात्ययोधैर्जववत्तुरङ्गैः । आयोधनं सज्यधनुःसहायः प्रसारयामास पुरःशरौघैः ॥५६॥ पश्चिम दिशा में पहुँच कर प्रकृष्ट चित्त वाले तथा मौर्वीयुत धनुष वाले राजा भीम ने अपने आगे वाणसमूह रखने वाले और वेगगामी घोड़ों वाले पाश्चात्य योद्धाओं से युद्ध छेड़ा ॥५६॥ खसानसाधूनसुभिर्वियोज्य स्वबन्धुभिः सिन्धुतटाधिवासान् । काम्बोजकाम्भोजवने तुषारैः शकान् स काण्डैः शकलीचकार ॥५७॥ दुष्ट खसों को प्राणों से वियुक्त करके तथा सिन्धु तट के वासियों को अपने बन्धुओं से वियुक्त करके, काम्बोज देशवासियों रूपी कमलवन के लिये तुषार रूप बाणों से उन्होंने शकों के टुकड़े टुकड़े उड़ा दिये ॥५७॥ इत्थं पराजित्य पराभिमर्दी नराधिनाथः प्रबलानरातीन् । तुरङ्गरत्नानि पुरङ्गतोऽसौ महार्हतेजांसि जहार तेषाम् ॥५८॥ शत्रु का दमन करने वाले श्रेष्ठ राजा भीमदेव ने इस प्रकार प्रबल शत्रुओं को परास्त करके उनके बड़े तेजस्वी बहुमूल्य तुरंगरूपी रत्नों को हर लिया ॥५८॥ आशामथासाद्य कुबेरगुप्तां स दुःसहं प्रज्वलयन् प्रतापम् । सारं कराक्रान्तिभरेण भास्वान् हिमाद्रिभूमे र्भृशमाचकर्ष ॥५९॥ तद्वश्चात् कुबेर द्वारा रक्षित उत्तर दिशा में जाकर भीमदेव ने हिमालय की भूमि का सार, अपने दुःसह प्रताप को प्रकट करते हुये, सूर्य के समान, करों (कर; किरणों) द्वारा लादे गये भार से, अच्छी तरह खींच लिया ॥५९॥ न कामरूपाक्रमणे तदानीं तेजःप्रकर्षोऽभिनवो ՚ नृपस्य । अयं हि देहप्रभया पुरैव विनापि यत्नं जितकामरूपः ॥६०॥ फिर भीमदेव ने कामरूप (आसाम) देश पर चढ़ाई की । अपने उत्कृष्ट तेज से कामरूप पर आक्रमण करना भीमदेव के लिये नई बात नहीं थी क्योंकि अपने शरीर की कान्ति से वे पहले ही, बिना यत्न किये ही, कामरूप (कामदेव के रूप) को जीत चुके थे ॥६०॥ इत्थं विधाय जगतीजययोग्ययात्रामुत्सादिताप्रतिभटक्षितिपालवर्गः । वृन्दावतीं रुचिरमङ्गलतोरणाङ्कां स प्राविशद् विशदकीर्तिपवित्रिताशः ॥६१॥ इस प्रकार जगद्विजय की यात्रा पूर्ण करके और शत्रु-राजाओं के समूह को नष्ट करके, भीमदेव अपने उज्वल यश से दिशाओं को पवित्र करते हुये, स्वागतार्थ सुन्दर और मांगलिक दरवाजों से सजाई हुई वृन्दावती (बूंदी) नगरी में लौट आये ॥६१॥ ॥ इति सुर्जनचरितमहाकाव्ये पञ्चमः सर्गः ॥

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