सुर्जन चरित महाकाव्यम् (कवि चन्द्रशेखर - बूँदी हाड़ा चौहान राजवंश शौर्य इतिहास सटीक)
Surjana Charita Mahakavya of Chandrashekhara with Commentary
कवि चन्द्रशेखर (सम्पादक: डॉ. चन्द्रधर शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० सुर्जनचरितमहाकाव्यम् अस्मिन् निशायामपि पुष्पितानां सरोरुहां रेणुभरैः पिशङ्गम् । स्वकान्तबुद्धया किल चक्रवाकी चक्राङ्गमाक्रन्दपरानुयाति ॥४९॥ यहाँ पुष्कर में रात में भी खिले हुये कमलों के पराग से ढके हुये और इसलिये पीले दिखाई देने वाले हंस के पीछे-पीछे चकवी (कमलों के खिलने से प्रभात का अनुमान लगा कर) उसे अपना पति समझ कर, कूजती हुई चल रही है ॥४९॥ स्वयं विधाता स विधिर्विधीनां सङ्कल्पमात्रोपचितैः पदार्थैः । त्रेतामिहाधाय जुहाव कुर्वन् त्रयीगिरो निस्त्रैगुणाः कृतार्थाः ॥५०॥ संकल्प-मात्र से समस्त पदार्थों को उपस्थित करके सम्पूर्ण विधियों को पूर्ण करने वाले, सब विधियों के स्वामी स्वयं ब्रह्मा जी ने यहाँ पुष्करतीर्थ में यज्ञ की तीनों अग्नियों को (गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिण) एकत्रित करके, वेद-मंत्रों को सचमुच निस्त्रैगुण्य सिद्ध करने के लिये निष्काम भाव से यज्ञ प्रारंभ किया (वेद प्रतिपादित यज्ञ कामनाओं के कारण किये जाते हैं जैसे- 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि, अतः वेद भी कामना पूर्ण करने के कारण त्रैगुण्यविषय हुये; किन्तु स्वयं ब्रह्मा जी को किसी कामना की आवश्यकता नहीं थी, अतः उन्होंने निष्काम भाव से यज्ञ करके मानों वेदों का निस्त्रैगुण्य होना सिद्ध किया) ॥५०॥ स्वयं स ईशः सकलस्य कर्ता समं समस्तैरपि देवतैस्तैः । मखैरखण्डैः कतमं नु देवं संप्रीणयामास न तं विदामः ॥५१॥ पूर्ण समर्थ और सम्पूर्ण सृष्टि को उत्पन्न करने वाले स्वयं ब्रह्मा जी ने, सब देवताओं को साथ लेकर, किस देवता को प्रसन्न करने के लिये वह अखण्ड यज्ञ किया, इस बात को हम नहीं जानते ॥५१॥ हुताशने यद् विधिवद् वितीर्णं सुधाभुजां नाम सुधा तदेव । वषट्कृतं यद् विधिनात्मनैव तत्रापि कः कल्पयितुं क्षमेत ॥५२॥ यज्ञ की अग्नि में विधिपूर्वक जो कुछ हवन किया जाता है वह अमृत बन जाता है और देवता उसे ग्रहण करते हैं; किन्तु (समस्त देवताओं से सेवित) स्वयं ब्रह्मा जी ने उस यज्ञ में जो आहुति दी, वह आहुति क्या बनी और किसने उसे ग्रहण किया इसकी कल्पना कौन कर सकता है ? ॥५२॥ सत्यामपि प्रार्थितवस्तुसिद्धेः समग्रतायामिह सप्ततन्तौ । वनान्तराद् व्योमसदां समूहः समित्कुशादीन् स्वयमाजहार ॥५३॥ समस्त वाञ्छित वस्तुओं की सम्पूर्ण सिद्धि विद्यमान होने पर भी ब्रह्मा जी द्वारा कृत उस यज्ञ के लिये स्वयं देवता गण वन में से समिधा और कुश इत्यादि लाये ॥५२॥ (४९) चक्राङ्गं हंसम् । (५०) त्रेतामग्नित्रयीं गार्हपत्याहवनीयदक्षिणरूपाम्। वेदप्रतिपादितयज्ञादिकर्मणां. 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि वचनात् काम्यकर्मरूपत्वात् 'त्रैगुण्यविषया वेदाः' इत्युक्तं, किन्तु विधिः स्वयं निष्कामभावेन यज्ञं कृतवा- निति वेदगिरो निस्त्रैगुण्यमेव तेन सम्पादितम् । (५२) यज्ञाग्नौ यद् विधिवत् हुतं तदेव सुधा भवति देवाश्च तद् गृह्णन्ति । उक्तं च माघैरपि- 'अमृतं नाम यत् सन्तो मन्त्रजिह्वेषु जुह्वति' इति । किन्तु यत् स्वयं ब्रह्मणा हुतं तत् किमभवत् केन च तद् गृहीतमिति विज्ञातुं कः समर्थो भवेत् ?