सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३० सूरसागर सार सटीक गन गंधर्व देखि सिहात । धन्य ब्रज-ललनानि कर तें, ब्रह्म माखन खात । नहीं रेख, न रूप, नहिं तनु, बरन नहिं अनुहारि । मातु-पितु नहिं दोउ जाकैं, हरत-मरत न जारि । आपु कर्त्ता आपु हर्त्ता, आपु त्रिभुवन नाथ । आपुहीँ सब घट कौ व्यापी, निगम गावत गाथ । अंग प्रति-प्रति रोम जाकै, कोटि-कोटि ब्रह्मांड । कीट ब्रह्म प्रजंत जल-थल, इनहिं तैं यह मंड । येइ विस्वंभरन नायक, ग्वाल-संग-विलास । सोइ प्रभु दधि दान माँगत, धन्य सूरजदास ॥१२८॥ अर्थ—गन्धर्वगण देखकर सिहाते है कि ब्रज की स्त्रियो से ब्रह्म (कृष्ण) मक्खन खाते हैं । जिनकी न कोई रेखा, न रूप है, न शरीर का कोई रङ्ग है, जिनकी समता नही है । माता-पिता दोनो जिसके नही हैं, जिसे न कोई हरता है और न जो स्वयं मरता है, न नष्ट होता है । जो स्वयं कर्त्ता है, स्वयं हर्त्ता है और तीनों लोकों का स्वामी है । स्वयं सब घटों मे व्याप्त है । वेद-शास्त्र जिनकी गाथा गाते हैं, जिनके एक-एक रोम मे करोडों ब्रह्माण्ड है । कीट से ब्रह्म तक जल, थल और नभ की इन्ही से शोभा है, यही विश्वम्भर नायक कृष्ण ग्वालो के साथ खेलते हैं । वही प्रभु दही का दान मांगते हैं । सूरदास कहते हैं कि (गोपियां) धन्य हैं ॥१२८॥ ब्रह्म जिनहिं यह आयसु दीन्हौ । तिन तिन सग जन्म लियौ परगट, सखी सखा करि कीन्हौ । गोपी ग्वाल कान्ह द्वै नाहीं, ये कहुँ नैंकु न न्यारे । जहाँ-जहाँ अवतार धरत हरि, ये नहिं नैंकु बिसारे । एकै देह बहुत करि राखे, गोपी ग्वाल मुरारी । यह सुख देखि सूर कै प्रभु कौँ, थकित अमर-संग-नारी ॥१२६॥ अर्थ—ब्रह्म (कृष्ण) ने जिन (लोगो) को आज्ञा दी, उन-उन (लोगो) ने इनके साथ जन्म लिया । (कृष्ण ने) इन्हे सखा और सखी करके (यथा उचित) माना । गोपी-ग्वाल और कृष्ण दो नही है । ये कही तनिक भी अलग नही है। जहां-जहां कृष्ण (अवतार) धरते हैं इन्हे तनिक भी नही भूलते । एक ही शरीर है उसे गोपी, ग्वाल और मुरारी के बहुत (रूपो) मे बना रखा है । सूरदास कहते है कि कृष्ण के इस सुख को देखकर देवताओ के साथ की स्त्रियां थकित (बेचैन) हो जाती हैं ॥१२६॥ यह महिमा येई पै जानैं । जोग-यज्ञ तप ध्यान न आवत, सो दधि-दान लेत सुख मानैं । खात परस्पर ग्वालनि मिलि कै, मीठौ कहि कहि आप बखानैं । विस्वंभर जगदीस कहावत, ते दधि दोना माँझ अघानैं ।