सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनन्दलाल में (ही) लगा है। (वह) हंसती है, नाराज होती है, बुलाती है और रोकती हुई कहती है कि इनकी चाल देखो। सूरदास कहते हैं कि इस व्याकुल विरहिणी को कृष्ण के बिना कुछ अच्छा नही लगता ॥१३५॥ गोपिका अनुराग लोक-सकुच कुल-कानि तजो। जैसेँ नदी सिंधु कौं धावै, वैसेहिं स्याम भजी। मातु-पिता बहु त्रास दिखायौ, नैकुँ न डरी, लजी। हारि मानि बैठे, नहिँ लागति, बहुतै बुद्धि संजी। मानत नहीं लोक मरजादा, हरि कैँ रङ्ग मजी। सूर स्याम कौं मिलि, चूनौ हरदी ज्यौँ रँजी ॥१३६॥ अर्थ-लोक के संकोच और कुल की मर्यादा को छोड़ दिया। जैसे नदी समुद्र की ओर उमडती है वैसे ही (गोपियो ने) कृष्ण को भजा। माता-पिता ने बहुत डराया (लेकिन वे) तनिक भी न डरी और न लजायी। (सब) हार मानकर बैठ गये, बहुत बुद्धि लगायी। (लेकिन बुद्धि) लगती नही। (गोपियां) लोक की मर्यादा नही मानती (वे) कृष्ण के रंग में रंग गयी। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण से मिलकर चूना और हल्दी की तरह रंग रंगित हो गयी ॥१३६॥ कहा कहति तू मोहिँ, री माई। नँद-नंदन मन हरि लियौ मेरौ, तब तैं मोकौँ कछु न सुहाई। अब लौं नहिँ जानति मैं को ही, कब तैं तू मेरैँ ढिग आई। कहाँ गेह, कहँ मातु-पिता हैं, कहाँ सजन, गुरुजन कहूँ भाई। कैसी लाज, कानि है कैसी, कहा कहति ह्वै ह्वै रिसहाई? अब तौ सूर भजी नँद-लालहिँ, की लघुता की होइ बड़ाई ॥१३७॥ अर्थ - हे सखी, तुम मुझे क्या कहती हो ? कृष्ण ने (जब से) मेरा मन हर लिया तब से मुझे कुछ भी अच्छा नही लगता। अब तक मैं नही जान पाई कि मैं कौन थी, तू कब से मेरे पास आयी। कहां घर, कहां माता-पिता है, पति कहां और गुरुजन तथा भाई कहां हैं। (मुझे कुछ भी नही मालूम) कैसी लज्जा, मर्यादा कैसी है, तुम लोग नाराज होकर क्या कह रहे हो ? सूरदास कहते है कि (गोपियां कहती हैं) अब तो कृष्ण को भजा है चाहे छोटाई हो चाहे बड़ाई ॥१३७॥ मेरे कहे मैं कोउ नाहिं। कहा कहौं, कछु कहि न आवै, नैकहुँ न डराहिँ। नैन ये हरि-दरस-लोभी, श्रवन सब्द-रसाल। प्रथमहीँ बन गयौ तन तजि, तब भई बेहाल। इन्द्रियनि पर भूप मन है, सबनि लियौ बुलाइ। सूर प्रभु कौँ मिले सब ये, मोहिँ करि गए बाइ ॥१३८॥