सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
पृष्ठ 154, कुल 359 में से
संदर्भ में पढ़ेंराधाकृष्ण १५३ अर्थ - कुँवरि राधा ने आंखें खोल दी, जब कृष्ण को देखा तो संकोच से अङ्गों को सम्हाला । (फिर) राधा माता से (एक) बात पूछती है कि यह आज क्या है ? (माता ने कहा) प्यारी आज तू मरने से बची, लाज क्यो करती हो। तब कहती है सांप ने काट लिया था इसलिए शरीर मे चेतना नही थी । सूरदास कहते है कि माता राधा से कहती हैं कि कृष्ण ने तुझे जिला लिया ॥१७॥ बड़ौ मंत्र कियौ कुँवर कन्हाई । बार-बार लै कंठ लगायौ, मुख चूम्यौ दियौ घरहिं पठाई । धन्य कोष वह महरि जसोमति, जहाँ अवतर्यौ यह सुत आई । ऐसी चरित तुरतहीँ कीन्हौँ, कुँवरि हमारी मरी जिवाई । मनहीँ मन अनुमान कियौ यह, बिधिना जोरी भली बनाई । सूरदास प्रभु बड़े गारुड़ी, ब्रज घर-घर यह घैरु चलाई ॥१८॥ अर्थ—कुँवर कृष्ण ने बड़े मंत्र का प्रयोग किया । (राधा की मां ने) कृष्ण को लेकर बार-बार गले से लगाया और मुख चूमकर घर भेज दिया । वह महरि यशोदा की कोख (कुक्षि) धन्य है, जिससे इस पुत्र ने जन्म (अवतार) लिया । तुरन्त ऐसा उपाय किया जिससे मेरी मरी हुई बेटी जी गई । फिर उन्होने मन-ही-मन अनुमान किया कि ब्रह्मा ने भली जोड़ी बनायी है । सूरदास कहते है कि कृष्ण बड़े गारुड़ी हैं, ब्रज के घर-घर में यह चर्चा चल पडी ॥१८॥ सम्बन्ध रहस्य तुम सौँ कहा कहौँ सुन्दर घन । या ब्रज मैं उपहास चलत है, सुनि सुनि स्रवन रहति मनहीँ मन । जा दिन सबनि पछारि, नोइ करि, मोहिं दुहि दई धेनु बंसीबन । तुम गही बाँह सुभाइ आपनैँ, हौँ चितई हँसि नैंकु बदन-तन । ता दिन तैँ घर मारग जित तित, करत चवाव सकल गोपीजन । सूर-स्याम अब साँच पारिहौँ, यह पतिब्रत तुम सौँ नँद-नंदन ॥१९॥ अर्थ— सुन्दर कृष्ण तुमसे क्या कहूँ । इस ब्रज मे हंसी होती है । कान से सुन- सुन कर मन-ही-मन (चुप) रह जाती हूँ। जिस दिन सब को पछाड़कर तुमने नयी गाय को नोइ (दुहने के समय रस्सी से गाय के पिछले पैर को बांध) कर वंशीवन मे दुहा और आपने स्वभाव वश (मेरी) बांह पकडी, (और) मैं तनिक (तुम्हारे) मुख की ओर देखकर किंचित हँस दी । उसी दिन से घर, मार्ग और जहाँ तहीं गोप जन कुचर्चा करते है। सूरदास कहते हैं कि (राधा कहती है) कि अब कृष्ण तुम्हारे प्रति सच्चे पति व्रत का पालन करूंगी ॥१९॥