सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ सूरसागर सार सटीक गति मैमंत नाग ज्यौं नागरि, करे कहति हों लीकी। सूरदास-प्रभु विविध भाँति करि, मन रिझयौ हरि पी कौ ॥३०॥ अर्थ-राधा तुम्हारा मुख अच्छी तरह से शोभित है। जब तुम इधर-उधर तिरछे देखती हो तो चन्द्रमा फीका हो जाता है। भौंह रूपी धनुष, नैन रूपी बाणों को साधे हुए है। मस्तक (सिर) पर केशर का टीका ऐसा जान पड रहा है मानो घूंघट के बीच कामदेव का शिकारी छिपकर बैठा हो। हे नागरि (तुम्हारी) चाल मतवाले हाथी के समान है, (यह सब) लकीर खींचकर कहती हूँ। सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) विविध भाँति (के श्रृङ्गार से) प्रिय कृष्ण के मन को (तुमने) रिझाया ॥३०॥ काकौ काकौ मुख माई बातनि कौं गहिये। पाँच की सात लगायी, झूठी-झूठी के बनायी, साँची जौ तनक होई, तौलौं सब सहियै। बातनि गह्यौ अकास, सुनत न आवै साँस, बोलि तौ कछू न आवै, तातैं मौन गहियै। ऐसैं कहैं नर नारि, बिना भीति चित्रकारि, काहे कौं देखे मैं कान्ह, कहा कही कहियै। घर घर यहै घैर, वृथा मोसौँ करैं वैर, यह सुनि स्त्रौन, हिरदय दहिए। सूरदास बरु उपहास होइ सिर मेरैं, नद कौ सुवन मिलै, तो पै कहा चहियै ॥३१॥ अर्थ-सखी किसके-किसके मुख की बातो को पकड़ा जाय। लोग पाँच का सात लगाते हैं, झूठी-झूठी बाते बनाते हैं। इसमे यदि कुछ भी सच हो तो उसे सहा भी जाय। बातो ही बातो मे आकाश छूते है, और ऐसी बातें सुनकर ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह जाती है। कुछ उत्तर में कहते नही बनता, अतः मौन धारण करना ही अच्छा है। इन लोगो (नर-नारियो) की बात ऐसी है, जैसे भीति के बिना चित्रावली की कल्पना करना। मैंने भला कान्ह को क्यों देखा होगा। क्या बताऊँ और क्या कहूँ, (इस गांव मे) घर-घर तो यही चर्चा चल रही है, जैसे कि सब मुझसे वैर रखते हों। कानो से सुन-सुन कर मेरा हृदय जलता है। सूरदास कहते हैं कि (अब तो राधा सब घोषित करती है) भले ही अब लोग मेरा उपहास उड़ाएँ, पर नन्द नन्दन कृष्ण मिल जाने पर फिर किसी को क्या चाहिये ॥३१॥ कैसे हैं नँद-सुवन कन्हाई। देखे नहीं नैन भरि कबहूँ, ब्रज मैं रहत सदाई। सकुचति हौँ इक बात कहति तोहिं, सो नहिं जाति सुनाई। कैसैं हुं मोहिं दिखावहु उनकौं, यह मेरैं मन आई।