सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० सूरसागर सार सटीक अनेक भाव दिखायेगे । सूरदास कहते हैं (गोपी कहती है) नवल तथा श्रेष्ठ कृष्ण पीताम्बर फहरायेगे ॥३४॥ माता की सीख काहे कौं पर-घर छिनु-छिनु जाति । घर मैं डांटि देति सिख जननी, नाहिंन नैंकु डराति । राधा-कान्ह कान्ह राधा व्रज, ह्वै रह्यौ अतिहि लजाति । अब गोकुल की जैबौ छाँड़ौ, अपजस हू न अघाति । तू वृषभानु बड़े की बेटी, उनकैं जाति न पांति । सूर सुता समझावति जननी, सकुचति नहिँ मुसुकाति ॥३५॥ अर्थ—दूसरे के घर क्षण-क्षण क्यो जाती हो । घर मे माता फटकार कर सीख देती है कि तुम तनिक भी नही डरती हो । राधा-कृष्ण और कृष्ण-राधा यही चर्चा व्रज मे व्याप्त हो गयी है, इससे (मुझे) अत्यधिक लाज लगती है । अब गोकुल का जाना छोड़ दो, अपयश से (तुम) नही अघाती हो । तुम श्रेष्ठ वृषभानु की बेटी हो, उन (कृष्ण) की जाति-पांति का कुछ ठीक नही है । सूरदास कहते हैं कि माता पुत्री को समझाती हैं । इससे राधा सकुचाती नही (बल्कि) मुसकाती है ॥३५॥ खेलन कौं मैं जाउं नहीं ? और लरिकिनी घर घर खेलति, मोहीँ कौं पै कहति तुहीँ । उनकैं मातु पिता नहिं कोई, खेलत डोलतिँ जहाँ तहीँ । तोसी महतारी वहि जाइ न, मैं रहौँ तुमहीँ बिनुहीँ । कबहूँ मोकौं कछू लगावति, कबहूँ कहति जनि जाहु कही । सूरदास बातैँ अनखौहीँ, नाहिंन मो पै जाति सही ॥३६॥ अर्थ—(राधा कहती है) मैं खेलने न जाऊँ ?-और लड़कियां घर-घर खेलती हैं; किन्तु तुम मुझे ही कहती हो । (क्या) उनके माता-पिता नही है, जहां-तहां खेलती डोलती हैं । तुम्हारी जैसी मां मर जाय, मैं तुम्हारे बिना ही रहूँगी । कभी मुझे कुछ लगाती हो, कभी कहती हो कही खेलने मत जाओ । सूरदास कहते हैं (राधा कहती है) यह क्रोध दिलाने वाली बात मुझसे सही नही जाती ॥३६॥ मनहौँ मन रीझति महतारी । कहा भई जौ बाढ़ि तनक गई, अबहौँ तौ मेरी है वारी । झूठैँ हीँ यह बात उड़ी है, राधा-कान्ह कहत नर नारी । रिस की बात सुता के मुख की, सुनत हँसति मनहीँ मन भारी । अब लौँ नहीँ कछू इहिँ जान्यौ, खेलत देखि लगावैँ गारी । सूरदास जननी उर लावति, मुख चूमति पोँछति रिस टारी ॥३७॥ अर्थ—मन-ही-मन माता रीझती है । क्या हुआ जो तनिक बढ़ गयी, अभी तो मेरी लड़की का बचपन ही है । यह बात झूठ ही उड़ गयी है और नर और नारी राधा