सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ सूरसागर सार सटीक अर्थ—कृष्ण ने आकर राधा को देखा । वह महामान दृढ़ करके बैठी है (उस मान को) कौन देख सकता है ? सुन्दरी क्रोध-ही-क्रोध मे मग्न हो गई है, (इसे देखकर) कृष्ण अत्यधिक अकुलाते है । वे चकित होकर खड़े रहे । उनके मुख से बात नही निक- लती है । कृष्ण को व्याकुल देखकर सखी विचार करती है कि ऐसा कोई उपचार करूं कि कृष्ण और राधा दोनो मिल जाएँ ॥१५४॥ यह ऋतु रूसिवे की नाहीं । बरषत मेघ मेदिनी कैं हित, प्रीतम हरषि मिलाहीँ । जेती बेलि ग्रीष्म ऋतु डाहीं, ते तरवर लपटाहीं । जे जल बिनु सरिता ते पूरन, मिलन समुद्रहिं जाहीं । जोबन धन है दिवस चारि कौ, ख्यौ, बदरी की छाहीँ । मैं, दंपति-रस-रीति कही है, समुझि चतुर मन माहीं । यह चित धरि री सखी राधिका, दै दूती कौँ बाहीं । सूरदास उठि चलि री प्यारी, मेरैं सँग पिय' पाहीँ ॥१५०॥ अर्थ—यह रूठने की ऋतु नही है । बादल पृथ्वी के हित मे बरस रहे हैं, (स्त्रियाँ) प्रियतम से हर्षित होकर मिल रही हैं । जितनी लताये ग्रीष्म ऋतु मे झुलस गयी थी, वे वृक्ष से लिपट रही हैं। जो नदियां बिना जल की हो गयी थी, वे जल से पूर्ण होकर समुद्र से मिलने जा रही हैं । यौवन धन केवल चार दिन का (क्षणिक) है, जैसे बादल की छाया । मैंने दम्पति के रस की रीति कह दी, हे चतुर मन मे समझो और अपने चित्त मे रख लो । सोच समझ कर दूती का अवलम्बन ग्रहण करो । सूरदास कहते हैं कि (सखी कहती है) हे प्यारी, मेरे साथ उठकर प्रिय के पास चलो ॥१५०॥ तोहि किन रूठन सिखई प्यारी । नवल बैस नव नागरि स्यामा, वे नागर गिरधारी । सिगरी रैनि मनावति बीती, हा हा करि हौँ हारी । एते पर हठ छांड़ति नाहीं, तू वृषभानुदुलारी । सरद-समय-ससि-दरस समरसर, लागै उन तन भारी । मेटहु त्रास दिखाइ बदन-बिंधु, सूर स्याम हितकारी ॥१५१॥ अर्थ—प्यारी तुम्हे रूठना किसने सिखा दिया । राधा नयी उम्र की नवीन चतुर सभ्य (कृष्ण की) प्रिया है । वे (कृष्ण) नागर गिरधारी है । सारी रात मनाते हुए बीत गयी, विनती करके मै हार गयी । इतने पर तू वृषभानु की लाड़िली (राधा) हठ नही छोड़ती । शरद के समय चन्द्र को देखकर काम का बाण उनके शरीर मे जोर से लग गया है । अपने चन्द्रमा के समान मुख को दिखा कर कृष्ण के भय को मिटा दो । (यह तेरा मुख ही) कृष्ण का हित करने वाला है ॥१५१॥ हरि-मुख राधा-राधा बानी । धरिनि परे अचेत नहीं सुधि, सखी देखि अकुलानी ।