भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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मथुरा गमन २१३ सुनतीं। मानों दूध ओर पानी की तरह मिल गयी और विलग करने पर भी नहीं होती। साथ मे मतवाले हाथी की तरह लग गयी, किसी प्रकार घेरने पर भी नही घिरती। सूरदास कहते हैं कि प्रेम का आशा अंकुश (जिनके) हृदय में (चुभा रहता है) वे इधर-उधर नही देखती हैं ॥५॥ (मेरे) कमलनैन प्राननि तैं प्यारे । इन्हें कहा मधुपुरी पठाऊँ, राम कृष्न दोऊ जन बारे । जसुदा कहै सुनी सुफलक-सुत, मैं इन बहुत दुखनि सौं पारे । ये कहा जानैं राज सभा कौं, ये गुरुजन बिप्रहुँ न जुहारे । मथुरा असुर समूह बसत हैं, कर-कृपान, जोधा हत्यारे । सूरदास ये लरिका दोऊ, इन कब देखे मल्ल-अखारे ॥६॥ अर्थ - मेरे कमल नैन, मुझे प्राणो से भी अधिक प्रिय है। बलराम-कृष्ण दोनों अभी कम उम्र के बालक है, इन्हें मथुरा कैसे भेजूं ? यशोदा कहती हैं हे सुफलक के पुत्र ! सुनो, मैंने इन्हे बहुत कष्ट से पाला है; ये राजसभा (की रीति) को क्या जाने, इन्हे गुरुजनो तथा विप्रो से प्रणाम करने का अभ्यास भी नही है। मथुरा मे राक्षसो का समूह, तथा हाथ में तलवार लेने वाले, हत्यारे योद्धा बसते हैं। सूरदास कहते हैं कि ये दोनों ही लड़के हैं, इन्होंने अखाड़े के मल्ल को कब देखा है ॥६॥ जसुमति अति हीं भई बिहाल । सुफलक सुत यह तुमहिं बूझियत, हरत हमारे बाल । ये दोउ भैया जीवन हमरे, कहति रोहिनी रोइ । धरनी गिरति, उठति अति ब्याकुल, कहि राखत नहिं कोइ । निठुर भए जब तैं यह आयौ, घरहूँ आवत नाहिं । सूर कहा नृप पास तुम्हारौ, हम तुम बिनु मरि जाहिं ॥७॥ अर्थ-यशोदा अत्यधिक व्याकुल हो गयी । सुफलक के पुत्र क्या हमारे बालकों का हरण करना, तुम्हारे लिए उचित है ? रोहिणी रोकर कहती है कि ये दोनों भाई हमारे जीवन है। पृथ्वी पर गिरकर अत्यधिक व्याकुल हो उठती हैं, (सोचती हैं) कि 'इन्हे कहकर कोई (क्यो नही) रख लेता । जब से यह (अक्रूर) आये हैं तब से (दोनो बालक) और निष्ठुर हो गये है, घर भी नही आते। सूरदास कहते है (रोहिणी कहती है) कि नृप के पास तुम्हारा क्या काम है, हम (तो) तुम्हारे बिना मर जायेगे ॥७॥ सुने हैं स्याम मधुपुरी जात । सकुचनि कहि न सकत काहू सौं, गुप्त हृदय की बात । संकित बचन अनागत कोऊ, कहि जु गयी अधरात । नींद न परै, घटै नहिं रजनी, कब उठि देखौं प्रात ।