सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय तथा भक्ति २१ कहा बिदुर की जाति-पाँति, कुल, प्रेम-प्रीति के लाहक । कह पांडव कैं घर ठकुराई ? अरजुन के रथ-बाहक । कहा सुदामा कैं धन हौ ? तौ सत्य-प्रीति के चाहक । सूरदास सठ, तातैं हरि भजि आरत के दुख-दाहक ॥८॥ अर्थ- श्याम (श्रीकृष्ण) निर्धनों के ही चाहने वाले हैं । हमारे प्रभु दीन-हीनों के स्वामी तथा सच्चे प्रेम का निर्वाह करने वाले हैं। बिदुर की जाति, श्रेणी, तथा कुल किस गिनती के थे किन्तु भगवान् ने उन्हे ग्रहण किया, [क्योंकि वे] प्रेम तथा भक्ति को [ही] ग्रहण करने वाले (लाहक) है। पाण्डवो के पास स्वामित्व कहाँ था ? किन्तु वे अर्जुन के रथ के सारथी बने । सुदामा के पास धन कहाँ था (होतौ) ? [जिससे वे भगवान् मे मित्रता स्थापित कर पाते] किन्तु भगवान् तो सच्चे प्रेम के ही चाहने वाले है। सूरदास कहते हैं कि इस बात को समझते हुए इस कारण (तातैं) हे शठ [मन] तुम भगवान् का भजन करो, [क्योंकि] वे आर्तों के दुख को दूर करने वाले है ॥८॥ जैसें तुम गज कौ पाउँ छुड़ायौ । अपने जन कौं दुखित जानि कै पाउँ पियादे धायौ । जहँ जहँ गाढ़ परी भक्तनि कौं तहँ तहँ आपु जनायौ । भक्ति हेत प्रहलाद उवार्यौ, द्रौपदि-चीर बढ़ायौ । प्रीति जानि हरि गए विदुर कैं, नामदेव-घर छायौ । सूरदास द्विज दीन सुदामा, तिहिं दारिद्र नसायौ ॥६॥ अर्थ-[हे प्रभु,] जैसे तुमने गज के पैर को [ग्राह्य से] छुड़ाया, [तथा उस अवसर पर] अपने भक्त को दुःखी जान कर पैदल ही दौड़ पड़े, [वैसे ही] जहाँ-जहाँ भक्तो पर विपत्ति पड़ी वहाँ-वहां आप प्रकट हुए। भक्ति के ही कारण [भगवान् ने] प्रह्लाद की रक्षा की तथा द्रौपदी का चीर बढ़ाया । [अपने प्रति निश्छल] प्रेम को जान कर ही भगवान् विदुर के घर गये तथा उन्होने नामदेव का घर छाया । सूरदास कहते हैं सुदामा निर्धन ब्राह्मण था, उसका भी दारिद्रय उन्होने विनष्ट किया ॥६॥ जापर दीनानाथ ढरै । सोइ कुलीन, बड़ी सुंदर सोइ, जिहिं पर कृपा करै । कौन विभीषन रंक-निसाचर, हरि हँसि छत्र धरै । राजा कौन बड़ौ रावन तैं, गर्वहिं-गर्व गरै । रकव कौन सुदामाहूँ तैं, आप समान करै । अंधम कौन है अजामील तैं, जम तहँ जात डरै । कोन विरक्त अधिक नारद तैं, निसि-दिन भ्रमत फिरै । जोगी कौन कड़ौ संकर तैं, ताकौँ काम छरै ।