भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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२३० सूरसागर सार सटीक को धिक्कार है, जो आधा कहते ही उठकर दौड़ पड़े। (जल्दी वापस चल पड़े) । सूरदास कहते हैं (यशोदा कहती हैं) कि कृष्ण के बिछुड़ने पर हमे बधाई देने चले आये ॥४३॥ नंद हरि तुमसौँ कहा कह्यौ । सुनि सुनि निठुर बचन मोहन के, कैसैँ हृदय रह्यौ । छाँड़ि सनेह चले मंदिर कत, दौरि न चरन गह्यौ । दरकि न गई बज्र की छाती, कत यह सूल सह्यौ । सुरति करत मोहन की वातैँ, नैननि नीर वह्यौ । सुधि न रही अति गलित गात भयौ, मन उसि गयौ अह्यौ । उन्हैँ छाँड़ि गोकुल कत आए, चाखन दूध दह्यौ । तजे न प्रान सूर दसरथ लौँ, हुतौ जन्म निवह्मो ॥४४॥ अर्थ— हे नन्द ! कृष्ण ने तुमसे क्या कहा। मोहन के निष्ठुर वचन सुनकर (तुम्हारा) हृदय कैसे (सुरक्षित) रहा। स्नेह छोड़कर घर की ओर कैसे चल पड़े, दौड़ कर (कृष्ण के) चरण क्यो नही पकड़े। तुम्हारी वज्र जैसी छाती दरक (फट) नही गयी, इस शूल को कैसे सहन किया। मोहन की बाते स्मरण करने से (यशोदा) के नेत्रो से आँसू बहने लगे । उन्हे कुछ स्मरण न रहा, शरीर अत्यधिक गलित (क्षीण) हो गया, मानो साँप उस गया हो । (यशोदा कहती है) उन्हें छोड़कर गोकुल मे दूध, दही चखने क्यो चले आये । दशरथ की तरह प्राण क्यों नही छोड़ दिये। अगर ऐसा किया होता तो (तुम्हारे) जीवन का निर्वाह हो गया होता ॥४४॥ कहाँ रह्यौ मेरौ मनमोहन । वह मूरति जिय तैँ नहिं बिसरति, अंग अंग सब सोहन । कान्ह बिना गौवैँ सब ब्याकुल, को ल्यावै भरि दोहन । माखन खात खवावत ग्वालनि, सखा लिए सब गोहन । जब वै लीला सुरति करति हौँ, चित चाहत उठि जोहन । सूरदास-प्रभु के बिछुरे तैँ, मरियत है अति छोहन ॥४५॥ अर्थ-मेरा मनमोहन कहाँ रह गया। वह मूर्ति प्राण से विस्मृत नही होती, उसके अंग-अंग सुशोभित थे । कृष्ण के बिना सभी गाये व्याकुल है, दोहनी भरकर कौन ले आये । सब सखाओं को साथ लेकर मक्खन खाते और खिलाते थे। जब उन लीलाओ को याद करती हूँ तो चित्त कहता है कि उठकर देखूं । सूरदास कहते हैं कि यशोदा कहती हैं कि मैं तो कृष्ण के वियोग के उत्पन्न होने से उनके अत्यधिक स्नेह से मरी जा रही हूँ ॥४५॥ गोपी बचन तथा ब्रजदशा ग्वारनि कही ऐसी जाइ । भए हरि मधुपुरी राजा, बड़े बंस कहाइ ।