भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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३१० सूरसागर सार सटीक विस्तार हो और मुड़ता है। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) मन तो कृष्ण के साथ चला गया और सांप के केंचुली की (तरह) इस शरीर को छोड़ गया ॥१२१॥ वै वातैं जमुना-तीर की। कबहुँक सुरति करत हैं मधुकर, हरन हमारे चीर की। लीन्हे वसन देखि ऊँचे द्रुम, रबकि चढ़न वलवोर की। देखि-देखि सब सखी पुकारतिं, अधिक जुड़ाई नीर की। दोऊ हाथ जोरि करि माँगैं, ध्वाई नंद अहीर की। सूरदास प्रभु सब सुख दाता, जानत हैं पर पीर की ॥१२२॥ अर्थ—यमुना के किनारे की चीरहरण सम्बन्धी बातो की क्या कभी कृष्ण याद करते हैं ? वस्त्र को लेकर कृष्ण उत्साहपूर्वक ऊंचे वृक्ष पर चढ गये । जल से शीतल हुई सखियाँ (कृष्ण को) देख देखकर पुकारती थी । नन्द अहीर की दोहाई देकर तथा दोनो हाथ जोडकर अपने वस्त्र मांगती हैं । सूर के प्रभु कृष्ण सब को सुख देने वाले है तथा वे पराई पीडा को जानने वाले हैं ॥१२२॥ प्रेम न रुकंत हमारे बूतें। किहिँ गयंद बाँध्यौ सुनि मधुकर, पदुम नाल के काँचे सूतैं ? सोवत मनसिज आनि जगायौ, पठै संदेस स्याम के दूतैं । विरह-समुद्र सुखाइ कौन बिधि, रंचक जोग अगिनि के लूतैं । सुफलक सुत अरु तुम दोऊ मिलि, लीजै मुकुति हमारे हूतैं । चाहतिँ मिलन सूर के प्रभु कौं, क्यौँ पतियाहिं तुम्हारे धूतैं ॥१२३॥ अर्थ—हमारे बल से प्रेम रुक नही सकता । ऊधो कहो कमल नाल के कच्चे धागे से किसने हाथी को बाँधा है। कृष्ण ने दूत भेजकर प्रसुप्त काम-व्यथा को जगा दिया । हम लोगो का विरह समुद्र आपकी थोडी-सी योगाग्नि की लपट से कैसे सूख सकता है ? अक्रूर तथा तुम दोनों मिलकर हमारी ओर से भी मुक्ति लीजिए । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) हम कृष्ण से मिलना चाहती हैं तुम्हारे जैसे धूर्त पर कैसे विश्वास करे ॥१२३॥ ऊधौ सुनहु नैकु जो बात । अबलनि कौँ तुम जोग सिखावत, कहत नहीँ पछितात्त । ज्यौँ ससि बिना मलीन कुमुदिनी, रवि बिनुहौँ जलजात । त्यौँ हम कमलनैन बिनु देखे, तलफि-तलफि मुरझात । जिन श्रवननि मुरली सुर आँचयौ, मुद्रा सुनत डरात । जिन अधरनि अमृत फल चाख्यौ, ते क्यौँ कटु फल खात । • कुंकुम चंदन घसि तन लावतिँ, तिहिँ न बिभूति जुहात । सूरदास प्रभु बिनु हम यौँ हैं, ज्यौँ तरु जीरन पात ॥१२४॥