भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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द्वारिका चरित ३३६ रुक्म रिसाइ पिता सौं कह्यौ। जदुपति -ब्रज जो चोरत मह्यौ। रुक्मनि कौं सिसुपालहिं दीजै। करि विवाह जग मैं जस लीजै। यह सुनि नृप नारी सौं कह्यौ। सुनि ताकौँ अंतरगत दह्यौ। रुक्म चँदेरी बिप्र पठायौ। ब्याह काज सिसुपाल बुलायौ। सो बारात जोरि तहँ आयौ। श्री रुकमिनि के मन नहिँ भायौ। कह्यौ मेरे पति श्री भगवान। उनहिँ बरौँ कै तजौँ परान। यह निहचै करि पत्री लिखी। बोल्यौ विप्र सहज इक सखी। पाती दै कह्यौ बचन सुनाइ। हरि को दै कहियौ या भाइ। भीषम सुता रुकमिनो बाम। सूर जपति निसि दिन तुव नाम ॥२॥ अर्थ—हरि का स्मरण करो (तथा) हरि के चरणरूपी कमल को हृदय मे धारण करो। जब रुक्मिणी ने हरि का स्मरण किया (तब) हरि ने कृपा करके उसका वरण किया। उसी कथा को कहता हूँ, मन लगाकर सुनो; जो (इस कथा को) कहता- सुनता है वह सुख पाता है। कुंडिनपुर के भीष्म राजा के मन मे विष्णु-भक्ति का चाव था। रुक्म आदि उसके पाँच पुत्र थे। हरि के रंग में रंगी रुक्मिणी (उसकी) एक पुत्री थी। नृपति ने रुक्म से भली-भांति कहा (कि) कुमारी (रुक्मिणी) के योग्य वर यदुराय (कृष्ण) हैं। रुक्म ने क्रोधित होकर पिता से कहा कि व्रज मे दही चुराता था (यह) यदुपति ! रुक्मिणी को शिशुपाल को दीजिए (तथा) विवाह करके जग मे यश लीजिए। यह सुनकर राजा ने स्त्री (पत्नी) से कहा, सुनकर उसका हृदय जल गया। रुक्म ने विप्र को चंदेरी भेजा (तथा) विवाह के लिए शिशुपाल को बुलाया। वह बारात जोड़कर वहाँ आया, (लेकिन) श्री रुक्मिणी के मन को (यह) अच्छा नही लगा। उसने कहा कि मेरे पति श्री भगवान् (है); उनको बरूँगी या प्राण छोड़ दूँगी। यह निश्चय करके (उसने) पत्र लिखा (तथा) सहज ही एक सखी से ब्राह्मण को बुलाया। पत्रिका देकर (यह) वचन सुनाकर कहा (कि) (पत्रिका) हरि को देकर इस प्रकार कहना (कि) भीष्म की पुत्री रुक्मिणी रात-दिन तुम्हारा नाम भजती है ॥२॥ द्विज पाती दै कहियौ स्यामहिँ। कुंडिनपुर की कुँवरि रुकमनी, जपति तिहारे नामहिँ। पा लागौँ तुम जाहु द्वारिका, नंद-नँदन के धामहिँ। कंचन, चीर-पटंबर दैहौँ, कर कंचन जु इनामहिँ। यह सिसुपाल असुचि अज्ञानी, हरत पराई बामहिँ। सूर स्याम प्रभु तुम्हरौ भरोसौ, लाज करौ किन नामहिँ ॥३॥ अर्थ—हे द्विज ! पत्रिका देकर स्याम से कहना कि कुंडिनपुर की कुमारी रुक्मिणी तुम्हारे नाम को जपती है। (मैं) पांव लगती हूँ तुम कृष्ण के धाम द्वारिका जाओ। मैं तुम्हे सोना, चीर-पटंबर (रेशमी वस्त्र) दूँगी (तथा) हाथ का कंगन इनाम

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