भारतकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 359 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 308

३४८ सूरसागर सार सटीक को झोपडी (टाटी) का कष्ट है (जिसके पास झोपड़ी भी नही है) उसे भी (प्रभु) अंगीकार करते हैं (उसकी चिन्ता भी उन्हे रहती है) ॥१७॥ भूलौ द्विज देखत अपनौ घर । औरहिं भाँति रची रचना रुचि, देखतही उपज्यौ हिरदै डर । कै वह ठोर छुड़ाइ लियौ किहुँ, कोऊ आइ बस्यौ समरथ नर । कै हौं भूलि अनतहीँ आयौ, यह कैलास जहाँ सुनियत हर । बुध-जन कहत दुबल घातक बिधि, सो हम आज लही या पटतर । ज्यों नलिनी बन छाँड़ि वसै जल, दाहै हेम जहाँ पानी-सर । पाछै तैं तिय उतरि कह्यौ पति, चलिए द्वार गह्यौ कर सौं कर । सूरदास यह सब हित हरि कौ, द्वारैं आइ भयौ जु कलपतर ॥१८॥ अर्थ—ब्राह्मण (सुदामा) अपना घर देखकर भ्रमित हो गया (वहां तो) और ही तरह की रुचिकर रचना रची थी, जिसे देखते ही (सुदामा के) हृदय मे डर उत्पन्न हुआ । या तो किसी ने वह स्थान (उसका पुराना घर) छीन लिया (और) (वहाँ पर) आकर कोई समर्थ व्यक्ति बस गया (किसी बलवान् ने कब्जा कर लिया) या तो मैं भूल कर अन्यत्र (ही) आ गया (हूँ), यह (कही) कैलाश तो नही है जहाँ शिव (का निवास) सुना जाता है । बुद्धिमान लोग कहते हैं कि विधाता दुर्बलो का घातक है उसका नमूना आज पा लिया (देखा) । जैसे कमलिनी वन छोड़कर जल मे बसती है, (लेकिन) जहाँ (वहाँ) पानी के तालाब मे (भी) उसे हिम दग्ध करता है ! पीछे से (सुदामा की) पत्नी उतरकर आयी (और) हाथ-से-हाथ पकडकर पति से बोली (कि) दरवाजे (घर) के (भीतर) चलिए । सूरदास (कहते है) (कि) यह सब हरि का स्नेह है (जिसके फलस्व- रूप द्वार पर आकर कल्पवृक्ष लग गया है !) ॥१८॥ कैसैँ मिले पिय स्याम सँघाती । कहियै कत कौन बिधि परसे, बसन कुचील छीन अति गाती । उठिकै दौरि अंक भरि लीन्हौ, मिलि पूछी इत-उत कुसलाती । पटतैँ छोरि लिए कर तंदुल, हरि समीप रुकमिनी जहाँ ती । देखि सकल तिय स्याम-सुँदर गुन, पट दै ओट सबै मुसक्यातीँ । सूरदास प्रभु नवनिधि दीन्ही, देते और जो तिय न रिसातीँ ॥१९॥ अर्थ—हे प्रिय ! मित्र साथी श्याम कैसे मिले । हे पति ! कहिये, (कृष्ण ने) मैले वस्त्रो वाले तुम्हारे अत्यन्त क्षीण शरीर को कैसे स्पर्श किया ? सुदामा ने कहा (कृष्ण ने) उठकर-दौडकर (मुझे) गले लगाया, (तथा) मिलकर यहाँ-वहाँ की (सबकी) कुशलता पूछी । वस्त्र से खोलकर हाथ मे चावल ले लिया, जहां (वहाँ) हरि के पास (ही) रुक्मनि भी थी । (उस समय) सभी स्त्रियां श्याम सुन्दर (कृष्ण) के गुणो को देखकर वस्त्र की ओट मे मुसकराती थी । सूरदास (कहते है) (कि) प्रभु (कृष्ण) ने