सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५४ सूरसागर सार सटीक आशीर्वाद देती हैं (कि) बहुत जुगो तक जियो । सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती हैं) (कि) (हे पथिक!) हमारी तरफ से नद के पुत्र (कृष्ण) के पैर पड़ना (प्रणाम करना) ॥३१॥ रुक्मिणी कृष्ण संवाद रुकमिनी बूझति हैं गोपालहिं । कहौ बात अपने गोकुल की, कितिक प्रीति ब्रजबालहिं । तब तुम गाइ चरावन जाते, उर धरते बनमालहिं । कहा देखि रीझे राधा सौं, सुंदर नैन विसालहिं । इतनी सुनत नैन भरि आए, प्रेम विवस नँदलालहिं । सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै, घोष बात जनि चालहिं ॥३२॥ अर्थ—रुक्मिणी कृष्ण से पूछती हैं (कि) (जरा) अपने गोकुल की बात (तो) कहो (और बताओ) ब्रज-बालाओं से (तुम्हारा) कितना प्रेम था । तब तुम गाय चराने जाते थे, हृदय पर वनमाल धारण करते थे । क्या देखकर (तुम) सुन्दर विशाल नेत्रो वाली राधा पर रीझे थे (उसकी विशेषताएं तो बताओ) । इतना सुनकर प्रेम से विवश कृष्ण के नेत्र भर आये । सूरदास (कहते है कि) प्रभु (कृष्ण) मौन हो रहे। (सिर्फ यही कहा) अहीरो की वस्ती (ब्रज) की बात (चर्चा) मत चलाओ ! ॥३२॥ रुकमिनी मोहिं निमेष न बिसरत, वे ब्रजवासी लोग । हम उनसौं कछु भली न कीन्हीं, निसि-दिन मरत वियोग । जदपि कनक मनि रची द्वारिका, विषय सकल संभोग । तद्यपि मन जु हरत बंसी-वट, ललिता कै संजोग । मैं ऊधौ पठयौ गोपिनि पै, दैन संदेसौ जोग । सूरदास देखत उनकी गति, किहिं उपदेसै सोग ॥३३॥ अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) हे रुक्मिणी ! मुझे क्षण भर भी ब्रजवासी-जन नही भूलते । हमने उनके साथ (अर्थात् उनकी) कुछ (भी) भलाई नही की; (वे) रात-दिन (मेरे) वियोग मे मरते हैं (दुख सहते हैं) । यद्यपि कनक तथा मणियों से द्वारिकां बनी है, सुख के सभी विषय (उपकरण) (वहाँ उपलब्ध हैं), तब भी वंशी-वट (के नीचे) ललिता का संयोग (सुख) मन को हर लेता है । मैंने ऊधो को गोपियो के पास योग का संदेश देने को भेजा था । सूरदास (कहते हैं कि) उन (गोपियों के प्रेम) की गति देखते हुए कौन शोक (युक्त) (योग का) उपदेश दे ? ॥३३॥ रुकमिनी मोहिं ब्रज बिसरत नाहीँ । वह क्रीड़ा वह केलि जमुन तट, सघन कदम की छाहीं । गोप बधुनि की भुजा कंध धरि, विहरत कुंजनि माहीं । और विनोद कहाँ लगि वरनौं, वरनत वरनि न जाहीं ।