सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० सूरसागर सार सटीक तजौ मन, हरि बिमुखनि कौ संग । जिनकैँ संग कुमति उपजति है, परत भजन मेँ भंग । कहा होत पय पान कराएँ, विष नहिँ तजत भुजंग । कागहिँ कहा कपूर चुगाएँ, स्वान न्हवाएँ गंग । खर कौँ कहा अरगजा लेपन, मरकट भूषन अंग । गज कौँ कहा सरित अन्हवाएँ, बहुरि धरे वह ढंग । पाहन पतित बान नहिँ बेधत, रीतौ करत निषंग । सूरदास कारी कामरि पै, चढ़त न दूजो रंग ॥४४॥ अर्थ—हे मन, असन्तो (दुष्टो) का साथ छोड़ दो। उनके साथ [रहने से] दुर्बुद्धि उत्पन्न होती है तथा भगवान् के भजन मे बाधा पड़ती है। [तुम्हारा यह सोचना कि उन्हे अपने भजन-भाव, सदुपदेश आदि द्वारा प्रभावित कर सकोगे। निष्फल है।] सांप को दूध पिलाने से क्या लाभ ? इससे वह अपना विष नही छोड़ता। कौवे को कपूर चुगाने तथा कुत्ते को गंगा मे नहलाने से क्या [लाभ] होता है ? (वे पुनः अभक्ष्य-भक्षण करते हैं)। गधे को सुगन्धित लेप करने तथा बन्दर के अंगो मे आभूषण पहनाने से क्या होता है ? हाथी को नदी में नहलाने से क्या होता है, वह पुनः अपना वही (अपने शरीर पर धूल डालने का) ढंग अपनाता है। पतित रूपी पत्थर सदुपदेश रूपी बाणों से विद्ध (प्रभावित) नही हो सकता उसे विद्ध करने की चेष्टा मे व्यर्थ ही तरकश खाली होता है (वाणो की बरबादी होती है)। सूरदास कहते है कि काले कम्बल पर दूसरा रङ्ग नही चढ़ता। [इसी प्रकार दुष्ट स्वभाव वाले मनुष्यो पर भी अच्छी बातो का प्रभाव नही पडता, अतः उनका परित्याग कर देना चाहिये] ॥४४॥ रे मन मूरख जनम गँवायौ । करि अभियान विषय-रस गीध्यौ, स्याम-सरन नहिँ आयौ । यह संसार सुवा-सेमर ज्यौँ, सुन्दर देखि लुभायौ । चाखन लाग्यौ रुई गई उड़ि, हाथ कछू नहिँ आयौ । कहा होत अब के पछिताएँ, पहिलेँ पाप कमायौ । कहत सूर भगवंत-भजन बिनु, सिर धुनि-धुनि पछतायौ ॥४५॥ अर्थ—रे मूर्ख मन, तुमने व्यर्थ ही यह जन्म गंवा दिया। अहंकार करके विषय वासना में लीन हो गये और श्याम (श्रीकृष्ण) की शरण मे नही आये। यह [सार- शून्य] संसार सुए द्वारा सेचित सेमल के समान है, [जिसके] सुन्दर फूलों को देखकर वह लुब्ध (आकर्षित) हुआ। किन्तु वह जब उसके फल का आस्वादन करने लगा तो रुई उड़ने लगी, और कुछ भी उसके हाथ नही लगा। अब पश्चात्ताप करने से क्या लाभ है ? अब तक तुम पाप ही कमाते रहे। सूरदास कहते है कि भगवान् के भजन के बिना अब सिर पीट-पीट कर [व्यर्थ] पश्चाताप करना ही रह गया ॥४५॥