सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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पक्वाजयगतानि । त्रणदोषाशयगतानि प्रक्षालनैः । वात-मूत्रपुरोषगर्भसंक्षेपे प्रवाहणमुक्तम् । मारुतोदकसविषरुधिरदुष्टस्तन्येष्वाचूषणमास्थेन विषाणेर्वा । अनुलोममनवबद्ध-मर्कणमनल्पत्रणमुखमयस्कान्तेन । हृद्यवस्थितमनेककार-णोत्पन्नं ओकशल्यं हर्षणेति ॥ ५ ॥
इनमें आँसू, छींक, उद्गार, कास, मूत्र, मल और वायु—इन स्वाभाविक शारीरिक शक्ति के कारण—रज आदि शल्य आँख आदि अवयवों से अपने पास बाहर आ जाते हैं। मांस में अन्दर घुसे शल्य—जो कि स्वयं न पकता हो, उसको औषधियों से पुष्काकर गला देना चाहिये। गल जाने पर पूय—रक्त वेग के कारण अथवा भारीपन से शल्य गिर पड़ता है और जो शल्य स्थान पक जाये, परन्तु स्वयं विदीर्ण न होता हो, उसका शस्त्रों द्वारा सेदन अथवा दारण कर देना चाहिये। जो शल्य भिन्न हो जाये परन्तु शल्य स्वयं बाहर न आता हो, उसको—पीड़न द्रव्यों से या हाथ से दबाकर बाहर करना चाहिए। इन्द्रियों के सूक्ष्म शल्यों को परिषेचन, आध्यापन से अथवा बाल-वस्त्र-हाथों से साफ करना चाहिये। खाते समय कण्ठ नासिका आदि में प्रविष्ट आहार शेष को, श्लेष्मा को, हीन-पतित-भ्रष्ट शल्यों को तथा अल्पावयववाले अणु शल्यों को—श्वसन (श्वास), कास, प्रथमन द्वारा बाहर निकालना चाहिये। अन्नशल्य को वमन द्वारा अंगुली आदि से घर्षण करके निकालना चाहिए। पक्वाशय में स्थित शल्यों को विरेचन द्वारा, त्रण द्रव्य (पूय) एवं त्रण की गुहा में प्रविष्ट अन्य शल्यों को प्रक्षालन द्वारा, वायु-मूत्र-मल और गर्भ की अपवृत्ति में प्रवाहण करना चाहिए। वायु-पानी, विष युक्त रक्त को, दूषित दूध को मुख या सींग द्वारा चूसकर बाहर करना चाहिये। त्रजुस्थित अनवबद्ध, (विशेष रूप से न फँसे), अकर्ण (अनुत्तुण्डित, कण्टकवाले मुखों से रहित), विस्तृत मुखवाले त्रण में से शल्य को अयस्कान्त द्वारा निकालना चाहिए। अनेक कारणों से उत्पन्न, हृदय में स्थित शोकशल्य को हर्ष द्वारा बाहर करना चाहिये।
वि० मन्तव्य—अक्षशल्यानि—अक्षो—इन्द्रियों के अधिष्ठानों (नेत्र, कर्णच्छिद्र नासारन्ध्र आदि) में से—बाल—बालों की कूची या वेणी, वस्त्र की बत्ती आदि पाणि-अंगुली-नख से। अन्नशल्य आमाशयगत अन्नशल्य को वमन से, दन्त या कण्ठ में फँसे अन्नशल्य को अंगुली से या नख से ॥५॥
सर्वशल्यानां तु महतामणूनां वा द्रावेवाहरणहेतुः भवतः—प्रतिलोमोऽनुलोमश्च ॥ ६ ॥
सब प्रकार के बड़े—या छोटे शल्यों को निकालने की विधियाँ दो ही प्रकार की हैं—एक प्रतिलोम और दूसरी अनुलोम ॥ ६ ॥
तत्र प्रतिलोममर्वाचीनमानयेत्, अनुलोमं पराचीनम्।
इनमें जो शल्य शरीर के अन्दर दूर तक प्रविष्ट नहीं हुआ हो (अर्वाचीन)—उसको उसी प्रवेश-मार्ग से बाहर निकालना चाहिए। क्योंकि दूसरे मार्ग से निकालने पर अविद्ध मार्ग भी विद्ध हो जाता है। और जो शल्य शरीर में बहुत दूर चला गया हो (पराचीन)—उनको अगले पराचीन प्रदेश में लेकर बाहर करना चाहिए। अनुलोमन-सीधा।
वि० मन्तव्य—अर्वाचीन जो अवयव में उभार रहता है और पराचीन जो पार चला जाता है। अर्वाचीन को—प्रतिलोम—उल्टा अर्थात् जिधर से धँसा है उधर ही से निकाले और पराचीन को—जिधर जा निकला है अर्थात् पार से ही निकाले ॥ ७ ॥
उत्तुण्डितं छिन्ना निर्घातयेच्छेदनीयमुखम् ॥८॥
उत्तुण्डित (उन्नत काँटों से व्याप्त) मुखवाले शल्य को निकालने के लिए दूसरी ओर काटकर फिर हाथ-मुद्गार से इधर-उधर हिलाकर अनुलोम या प्रतिलोम मार्ग से इसी प्रकार बाहर करना चाहिये ॥८॥
छेदनीयमुखान्यपि कुक्षिवस्त्रःकक्षावंक्षणपशुंकान्तर-पतितानि च हस्तशक्यं यथामार्गं हस्तेनैवापहतुं प्रय-तेत ॥ ९ ॥
कुक्षि, वस्त्र, कक्षा, वंक्षण, पशुकाओं के बीच में फँसे शल्य को हाथ से ही निकालने का प्रयत्न करना चाहिए ॥ ९ ॥
हस्तेनैवापहतुंमशक्यं विशस्य शस्त्रेण यन्त्रेणापहरेत्। यदि हाथ से बाहर न निकाला जा सके तो शस्त्र या यन्त्र से काटकर बाहर निकालना चाहिये ॥ १० ॥
भवति चात्र—
शीतलेन जलेनैन मूर्छन्तमवसेचयेत्। संरचैदस्य मर्माणि मुहुर्वाश्वासयेच्च तम् ॥११॥
कहा भी है—
मूर्च्छित होते हुए पुरुष को शीतल जल से सिंचन करना चाहिये। क्षीर तर्पण आदि से इस रोगी के मर्मों (मस्तिष्क) की रक्षा करते हुए—बार-बार आश्वासन देते रहना चाहिये।
वि० मन्तव्य—जब शल्य को खींचकर निकाला जाता है तब इतना कष्ट होता है कि रोगी मूर्च्छित हो जाता है। उस समय उत्त उपचार करे ॥ ११ ॥
ततः शल्यमुद्घृत्य निलोहितं त्रणं कृत्वा स्वेदाहै-मग्निघृतप्रभृतिभिः संस्वेद्यावद्व्य प्रदिह्य सर्पिर्मधुभ्यां बद्धवाऽऽचारिकमुपदिशेत्। (सिरास्तनायुविलग्नं शलाका-दिभिर्विमोच्यापनयेत्, श्वयथुप्रस्तवारङ्गं समवपीड्य श्वयथुं दुर्बलवारङ्गं कुशादिभिर्वद्धवा।) ॥१२॥
इसके पश्चात् शल्य को निकालकर त्रण को रक्तरहित बनाकर, स्वेद्योग्य (त्रण) को अग्नि, घी आदि से स्वेद देकर,