सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ
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सुश्रुतसंहिता
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| शस्त्रक्रिया का उपदेश | १७ |
| शस्त्रकर्म में व्रण की प्रशस्त आकृति | १७ |
| शस्त्रकर्म करनेवाले वैद्य के गुण | १८ |
| एक व्रण से घाव पूरा साफ न होने से अन्य व्रण बनाने चाहिए | १८ |
| व्रण में जहाँ भी पूय की गति देखे अथवा पूय संचय हो गया हो व्रण कर देना चाहिये | १८ |
| तिरछा छेदन कहाँ करना चाहिये | १८ |
| अर्धचन्द्राकार छेदन कहाँ करना चाहिये | १८ |
| उपर्युक्त विधि से छेदन न करने पर दोष | १८ |
| किन रोगों में रोगी को बिना खिलाये शस्त्रकर्म करना चाहिये | १८ |
| शस्त्रकर्म के पश्चात् कर्म ✓ | १८ |
| व्रण का धूपन | १८ |
| धूपन द्रव्य | १८ |
| राक्षसों के भय को दूर करने के लिये रक्षाकर्म | १८ |
| आहार विहार का उपदेश | २० |
| व्रण को खोलने का समय | २० |
| कषाय, लेपन, वन्धन आहार-विहार की विधि | २० |
| व्रण का रोपण कब करना चाहिये ✓ | २० |
| ऋतु के अनुसार पट्टी करनी चाहिये ✓ | २० |
| इसमें अपवाद | २० |
| शस्त्र क्रिया के कारण उत्पन्न हुई तीव्र वेदना को शान्त करने का उपाय | २० |
पष्टोऽध्यायः
| ऋतुओं में किस प्रकार का आचरण करना चाहिये | २० |
|---|---|
| काल की व्याख्या | २० |
| संवत्सर रूपी धीरीर वाले काल का विभाग | २१ |
| छः ऋतुओं का विभाग | २१ |
| दक्षिणायन तथा उत्तरायण दो अयन विभाग | २१ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| चन्द्र सूर्य का आश्रय करके वायु प्रजा का पालन करती है | २२ |
| युग का वर्णन | २२ |
| ऋतुयें वातादि दोषों के संचित प्रकोप प्रशमन में कारण हैं | २३ |
| प्रकुपित हुए दोषों को दूर करने का उपदेश | २३ |
| कालस्वभाव के कारण वातपित्तादि दोषों की शान्ति कब होती है | २३ |
| सांवत्सरिक विधि को दिन रात में भी कहते हैं | २३ |
| अदूषित ऋतुओं में गेहूँ चने आदि वनस्पतियाँ तथा पानी निर्दोष होते हैं | २३ |
| इन ऋतुओं में विपरीतता का कारण अधर्म है | २४ |
| दूषित अन्न पान से महासारी आदि फैलती है | २४ |
| अन्य कारण जिनसे जनपद नष्ट होते हैं | २४ |
| इनकी सामान्य चिकित्सा | २४ |
| अव्यापन्न ऋतुओं के लक्षण | २४ |
| ऋतुओं के स्वभाविक गुणों में अत्यधिकता के कारण अथवा स्वभाविक गुणों में विपरीतता के कारण प्राणियों के वातादि दोष कुपित हो जाते हैं | २५ |
| रोगोत्पत्ति से पूर्व ही दोषों का शमन करना चाहिये | २५ |
सप्तमोऽध्यायः ✓
| यंत्रविधि अध्याय का वर्णन | २६ |
|---|---|
| यंत्रों की संख्या | २६ |
| यंत्र कैसे कहते हैं | २६ |
| यंत्रों के भेद | २६ |
| यंत्र किसके बनते हैं | २६ |
| यंत्रों की बनावट | २६ |
| उपसंहार | २६ |
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| स्वस्तिक यंत्रों का प्रमाण तथा आकार | २६ |
| संदेश यंत्र | २७ |
| ताल यंत्र | २७ |
| नाड़ी यंत्र | २७ |
| शलाका यंत्र | २८ |
| उपयन्त्र | २८ |
| यंत्रों के उपयोग | २८ |
| यंत्रों के कर्म | २९ |
| उपसंहार | २९ |
| यन्त्र दोष | २९ |
| कैसे यंत्र बरतने चाहियें | ३० |
| भिन्न भिन्न यंत्रों से क्या काम लेना चाहिये | ३० |
| कंकमुख यंत्र सब में प्रधान है | ३० |
अष्टमोऽध्यायः ✓
| शस्त्रावचारणीय अध्याय की व्याख्या | ३० |
|---|---|
| शस्त्रों की संख्या—(आकार नाम से स्पष्ट है) | ३० |
| शस्त्रों का उपयोग | ३० |
| शस्त्रों को पकड़ने की विधि | ३१ |
| शस्त्रों के गुण | ३१ |
| शस्त्रों के दोष | ३१ |
| अधविध कार्य में धारका निश्चय | ३२ |
| बद्धिश तथा एषणी यंत्र की धार | ३२ |
| पायना कैसे कहते हैं और उसके प्रकार | ३२ |
| शस्त्रों की तेज कैसे करना चाहिये | ३२ |
| धार की पहिचान | ३३ |
| अनुग्रन्थ और उनका उपयोग | ३३ |
| शस्त्रों का परिचय अत्यावश्यक | ३३ |
| नवमोऽध्यायः | |
| योग्यास्त्रीय अध्याय की व्याख्या | ३३ |