भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 236

१८८

मुश्रुतसंहिता

[ अ० ४६ ]

शालि से लेकर सरसों तक नाना प्रकार के आहार द्रव्यों को काल-प्रमाण (एक साल पुराना) संस्कार (ब्रीहि गुरु होने पर संस्कार—पाकविशेष से ताजा रूप हरके, लघु' हो जाते हैं), मात्रा—(अग्निबल की अपेक्षा करती है, तीन प्रकार की है, हीन, मध्य और उत्तम) भेद से कह दिया है।

वि० सन्तव्य—शूक धान्य-जिन पर शूक (छोटा या बड़ा शूक)—तीखा तूट होता है, यथा सब प्रकार के चावल तथा गेहूँ जो आदि, शिम्बी धान्य-जो फली के भीतर होते हैं, जैसे माष, मूंग आदि, इनको “शमी धान्य” कहते हैं। शालि वे हैं जो जलप्लावन चाहते हैं या जिनको अधिक जल की आवश्यकता होती है। पक्षिक धान्य-जो बोने पर ६० दिन में पक जाते हैं। जैसे मक्का चुनरी आदि। कुधान्य-कुस्तित या निम्न-श्रेणी के धान्य या तृण धान्य-घास के रूप में उपलब्ध धान्य, यथा-कोदो सामा आदि। वैदलधान्य-जिनके बीज में दो दाल होते हैं। इन्हीं का नाम शिम्बी धान्य है। धान्य का अर्थ है—धाने पोषणे साधुः। (पोषण)—शरीर पोषण में साधक। खाद्य या भोजनोपयोगी औषध बीज ॥५२ ॥

अथ मांसवर्गः।

अत उच्चं मांसवर्गोत्पदेक्ष्यामः, तद्यथा—जलेगया आनूपाः, ग्राम्याः, क्रयमुजः, एकशफाः, जाङ्गलाश्चेति षण्मांसवर्गा भवन्ति। एतेषां वर्गाणां मुत्तरोत्तरा प्रधानतमाः। ते पुनर्द्विविधा जाङ्गला आनूपाश्चेति। तत्र जाङ्गलवर्गोऽष्टविधः तद्यथा—जङ्गलाः, विक्किराः, प्रतुदाः, गुहाशयाः, प्रसहाः, पर्णमृगाः, विलेशयाः, ग्राम्याश्चेति। तेषां जङ्गला विक्किरी प्रधानततमा ॥५३॥

इसके आगे मांस वर्ग को कहते हैं—

यथा—मांसवर्ग छे भागों में विभक्त है—जलेशय (जल में रहनेवाले), आनूप (जलबहुल प्रदेश में रहनेवाले, महिष आदि), ग्राम्य (गाय आदि), क्रयमुज (मांस खानेवाले, गुहाशय और प्रसह); एक शफवाले (घोड़े आदि) और जाङ्गल (जंघाल, विक्किर, प्रतुद, पर्ण मृग, विलेशय) ये छः भेद हैं। इन वर्गों में उत्तरोत्तर श्रेष्ठता है। छे प्रकार के होने पर भी स्थानभेद से दो प्रकार के हैं—जंगल और आनूप। यह जंगल-वर्ग आठ प्रकार का है। यथा—जंघाल, विक्किर, प्रतुद, गुहाशय, प्रसह, पर्णमृग, विलेशय और ग्राम्य। इनमें जंघाल और विक्किर श्रेष्ठ हैं ॥५३॥

तत्रैण हरिणक्षीरकुरङ्गरालकृतमालशरभश्वदंष्ट्रापुषतचारुष्करमृगमातृकाप्रभृतयो जङ्गला मृगाः कषाया मधुरा लघवो वातपित्तहरास्तीक्ष्णा हृद्या बर्त्तितोघनाश्च ॥५४॥

—१ लघुपाकी का लक्षण—

“लघु पथ्यतमं प्रोक्तं गुर्वपथ्यतमं स्मृतम्।

पाकं गच्छति यच्छीघ्रं तत्तल्लघुतरं स्मृतम् ॥”

इनमें जंघाल—(प्रशस्त जंघावाले)—एण (काला) हरिण (श्वेत हरिण), मृक्ष (नीलाण्ड), कुरङ्ग (चतुरङ्ग), कराल (कस्तूरा) कृतमाल (समूह में रहने वाले मृग), शरभ (जंतु के समान, बड़े सींगों का); श्वदंष्ट्रा (चतुर्दंष्ट्र), पुषत (चित्तल) चारुष्कर (चारु शरीर), मृगमातृका (मोटे पेटवाली) आदि जंघाल मृग हैं। गुण—कषाय, मधुर, वात पित्तनाशक, तीक्ष्ण, हृदय के प्रिय, वस्ति (मूत्रकुच्छ, मूत्राघात आदि में पथ्य, मूत्रविरेचक हैं) ॥५४॥

कषयामधुरो हृद्यः पित्तासूकफरोगहा ।

संप्राही रोचनो बल्यस्तेषामेणो ज्वरापहः ॥५५॥

एण मृग—कषायरस, मधुरवीर्य, हृदय के लिये प्रिय, पित्त-रक्त-कफरोग-नाशक, संप्राही, रोचक, बलकारक, एवं ज्वरनाशक है ॥५५॥

मधुरो मधुरः पाके दोषघ्नोऽनलदीपनः ।

शीतलो बद्धविषमूत्रः सुगन्धिर्हरिणो लघुः ॥५६॥

कृष्ण हरिण—मधुररस, मधुर विपाक, दोषनाशक, अग्नि-दीपक है। सुगन्ध हरिण—शीतल, मल-मूत्र का अवरोधक (इसलिये अतिशय एवं प्रमेही रोगियों के लिये पथ्य) और लघु है ॥५६॥

एणः कृष्णस्तयोर्ज्यो हरिणस्तात्र उच्यते ।

यो न कृष्णो न ताम्रश्च कुरङ्गः सोऽभिधीयते ॥५७॥

एण और हरिण में भेद—काले मृग को एण कहते हैं, ताम्रवर्ण को हरिण कहते हैं। और जो न काला एवं न ताम्र वर्ण होता है उसे कुरङ्ग कहते हैं ॥५७॥

शीताऽसूकपित्तशमनो विज्ञेया मृगमातृका ।

सन्निपातक्षयशवासकासहिंकारुचिप्रणुत् ॥५८॥

मृगमातृका—शीतवीर्य, रक्त-पित्तशमक, सन्निपात, क्षय, शवास, कास, हिंस्की एवं अस्विनाशक है ॥५८॥

लावति तिरिकपिङ्गलवर्तीरवर्तिकावर्तकनप्लुकावर्तिक-चकोरकलविङ्कमयूरककरोपचक्रकुक्कुटसारङ्गशतपत्रकृति-तिरिक्कुस्वाहकयवालकप्रभृतयस्याहला' विक्किराः ॥५९

लघवः शीतमधुराः कषायाः दोषनाशनाः ।

विक्किर (विलेखर खानेवाले)—लाव (बटर), तित्तिरि (तीतर), कपिङ्गल (गौर तित्तिर), वर्तीर (कपिजल), वर्तिका (वर्तीर से बड़ा), वर्त्तक, नप्लुका (घुघू), वर्तीक (वर्त्तिचटक), चकोर, कलविक (काला चटक), मयूर, ककर (कयार), उपचक्र (चक्रवाक), कुक्कुट, सारङ्ग (चातक), शतपत्रक (कर्पूडी), कुत्तिरि, कुस्वाहक (कुस्सक), यवालक (यवगुड़क), आदि

१ आहला का अर्थ—चञ्चु और दोनों पञ्जों से चोट करके खाते हैं, इसलिये आहला कहते हैं।