भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० १ ] ४६

चिकित्सास्थानम्

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मुख खुला है और जो मांस में स्थित हैं, उनमें कही बिधि से सीना चाहिये, और इनका सन्धान करना चाहिये ॥४५॥

पूयगर्भानुद्वारान् ब्रणान्मर्मगतान्पि ।

यथोक्तैः पीडनद्रव्यैः समन्तात् परिपीडयेत् ॥४६॥

मुष्कमाणमुपेक्षेत प्रदेहं पीडनं प्रति ।

न चाभिमुखमालम्पितथा दोषः प्रसिच्यते ॥४७॥

पूय से भरे, छोटे मुखवाले, मर्मगत ब्रणों में कहे हुए पीडनद्रव्यों से चारों ओर में पीडन करना चाहिये। पीडन कार्य में प्रदेहलेप को सूखने देना चाहिये। ब्रण के मुख पर लेप लगाने से दोष बाहर नहीं आता ॥४६, ४७॥

तैस्तैनिमित्तैर्बहुधा शोणिते प्रसूते भृशम् ।

कार्य यथोक्तं वैद्यान् शोणितस्थापनं भवेत् ॥४८॥

सिरावेष आदि भिन्न-भिन्न कारणों से रक्त के बहुत अधिक निकलने पर वैद्य यथोक्त बिधि से रक्त स्थापन (रक्त को रोकना) करे। (सन्धानं स्कन्दनं चैव पाचनं दाहनं तथा) ॥४८॥

दाहपाकञ्चरवतां ब्रणानां पित्तकोपतः ।

रक्तेन चाभिभूतानां कार्यं निर्वापणं भवेत् ॥४९॥

यथोक्तैः शीतलद्रव्यैः क्षीरपिष्टघृतान्प्लुतैः ।

द्विधादबहुलान् सेकान् सुशीतान्वावचारयेत् ॥५०॥

पित्त प्रकोप के कारण दाह, पाक, ज्वर होने पर या रक्त से आकान्त ब्रणों में निर्वापण करना चाहिये। इसके लिये मिश्र-कोक दूग्दिद्रव्यों को दूध के साथ पीसकर घी मिलाकर पतला लेप करे। अतिशीतल सेक (परिषेक) करे।

वक्तव्य—“शुल्कृणुपिष्टो घनो लेपः चन्दनस्यापि दाहकृत् । त्वगत्तस्योष्मणो रोधात्” चरक।

वि० मन्तव्य—निर्वापण—दाह शान्ति का उपाय, शीतल उपचार ॥४६, ५०॥

ब्रणेषु क्षोणमांसेषु तनुस्त्राविष्वपाकिषु ।

तोदकाटिन्यपास्यशुल्लवेपशुमत्सु च ॥५१॥

वातघ्नवर्गोऽम्लगणे काकोल्यादिगणे तथा ।

स्नेहिकेषु च बीजेषु पचेदुत्कारिकां शुभाम् ॥५२॥

तेषां च स्वेदनं कार्यं स्थिराणां वेदनावताम् ।

क्षोण मांसवाले, पतले खाववाले, न पकनेवाले तोद-कटिनता रूक्षता शुल्क एवं कम्पनवाले, तथा स्थिर एवं वेदनावाले ब्रणों में—भद्रवाण्यादि वातघ्न, सौवीरक, तृषोदक आदि अम्लवर्ग और काकोल्यादिगण, तिल-अलसी-सरसों एरण्ड आदि लेववाले बीजों के साथ उत्कारिका-पकाकर इससे स्वेदन करे।

वि० मन्तव्य—उत्कारिका-लपसी-हलुआ या पुलिस्त्य बनाकर गरम-गरम बाँधे ॥५१, ५२॥

दुर्गन्धानां क्लेदवतां पिच्छलानां विशेषतः ॥५३॥

कषायैः शोधनं कार्यं शोधनैः प्रागुदीरितैः ।

अन्तःश्लयान्पुमुखान् गम्भीरान् मांससंश्रितान् ॥५४॥

शोधनद्रव्ययुक्तान्पिर्वर्तिभित्तान् यथाक्रमम् ।

पूतिमांसप्रतिच्छन्नान् महादोषान् शोधयत् ॥५५॥

कल्कीकृतैर्यथाभाभं वर्तितद्रव्यैः पुरोदितैः ।

दुर्गन्धवाले क्लेदयुक्त विशेषकर पिच्छल ब्रणों में पहिले कहे हुए (शस्त्रिनी अंकोट सुमनादि) द्रव्यों के शोधन कषायों से शोधन करे। अन्दर शल्यवाले, सूक्ष्म मुखवाले, गहरे, मांस में स्थित ब्रणों का क्रम से (प्रथम सूक्ष्म, फिर स्थूल, फिर स्थूलतर, फिर स्थूलतम) शोधन द्रव्य युक्त वर्त्तियों से शोधन करे। सर्व मांस से ढँपे हुये, और बहुत दोषवाले ब्रणों का पूर्वोक्त वर्त्तिद्रव्यों में से जो मिल सकें उनको पीसकर शोधन करे। ('दोष' से पूय लेना चाहिये) ॥५३-५५॥

पित्तप्रदुष्टान् गम्भीरान् दाह पाकप्रपीडितान् ॥५६॥

कार्पासोफलमिश्रेण जयच्छाधनसर्पिषा ।

पित्त से दूषित, गहरे गये, दाह-पाक से युक्त ब्रणों का कासीस, अजगन्धा आदि द्रव्यों में कपास का फल मिलाकर इनसे घृत सिद्ध करके, उससे शोधन करे।

वक्तव्य—दलहण का कहना है कि—कार्पास फल शोधन द्रव्यों के बराबर, इनके कल्क से चारगुणा घी, घी से चारगुणा जल मिलाकर घृत बनाये। दूसरे इन द्रव्यों में घी मिलाकर लगाते हैं ॥५६॥

उत्सन्नमांसान्स्निग्धानलपस्त्रावान् ब्रणांस्तथा ॥५७॥

सर्पपरनेहयुक्तेन धीमांस्तैलेन शोधयत् ।

ऊपर उठे मांसवाले, अस्निग्ध (स्नेह रहित), अल्प खाववाले ब्रणों का बुद्धिमान वैद्य सरसों के तेल को तिलतैल और मिश्रकोक मयूरारि शोधन द्रव्यों से सिद्ध करके तैल से शोधन करे ॥५७॥

तैलेनाशुध्यमानानां शोधनीयां रसक्रियाम् ॥५८॥

ब्रणानां स्थिरमांसानां कुर्थाद् द्रव्यैरुदीरितैः ।

कषायै विधिवत्सेषां कृते चाधिश्यते पुनः ॥५९॥

सुरापूजां सकासीसां दद्याच्छापि मनःशिलाम् ।

हरितालं च मतिमांस्ततस्तामवचारयेत् ॥६०॥

मातुलुङ्करसोपेतां सक्षोद्राम्तिमर्दिताम् ।

ब्रणेषु दत्त्वा तां तिष्ठेत् त्रींक्षींश्च दिवसान् परम् ॥६१॥

जो ब्रण तैल से शुद्ध न होते हों, एवं स्थिर मांसवाले हों, उनमें शोधनीय द्रव्यों से बनाई रसक्रिया को बरतें। इस के लिये मिश्रकोक शालसारदि द्रव्यों को बवाथ विधि से बवाथ करके इस कषाय को पुनः अग्नि पर पकाये। पकाते समय इसमें फिटकरी, कासीस, मैनसिल, हरताल-इनको (कषाय का चतुर्थीश), मिलाये। पकाते हुए जब यह दवायलेप रूप में सब

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