भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ १०]

चिकित्सास्थानम्

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जिस प्रकार सामान्य कर्मों में विशेष कर्मों का समावेश हो जाता है, इसलिये छेँ ही सबसे श्रेष्ठ हैं।

वक्तव्य—उपसर्ग लगाकर—सम्यग्-छिन्नम् संछिन्नम् । परितः छिन्नं, परिछिन्नम् । निपात से—अतिकम्प छिन्नम्-अति-छिन्नम् । अल्पं छिन्नम् ईषत् छिन्नम् ॥६६,६७॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने सद्योत्रणचिकित्संतं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥

तृतीयोऽध्यायः

अथातो भग्नानां चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे भग्नचिकित्सा का व्याख्यान करेंगे जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—भग्न का विवरण नि० स्था० अ० १५ में देखिये ॥१,२॥

अल्पाशिनीऽनात्मवतो जन्तोर्वातात्मकस्य च ।

उपद्रवैर्वा जुष्टस्य भग्नं कृच्छ्रेण सिध्यति ॥३॥

थोड़ा खानेवाले, अजितेन्द्रिय, वात प्रधान, या उपद्रवों से युक्त व्यक्ति में भग्न रोग कठिनाई से अच्छा होता है ॥३॥

लवणं कटुकं क्षारमम्लं मैथुनमातपम् ।

व्यायामं च न सेवेत भग्नो रूक्षान्मेष च ॥४॥

भग्न रोगी—लवण, कटुरस, क्षार, अम्ल, मैथुन, धूप, व्यायाम और रूक्ष भोजन का सेवन न करे ॥४॥

शालिर्मांसरसः क्षीरं सर्पियुषः सतीनजः ।

बृहणं चान्तपानं स्याद्देयं भग्नाय जानता ॥५॥

भग्नरोगी—को जाननेवाला वैद्य, शालि, मांसरस, दूध, घी, मटर का घी से बनाया यूप, बुद्धिकारक खान पान देवे। (मटर-वातकर होने पर भी घी आदि से संस्कृत करके दिया जाता है) ॥५॥

मधुकोटुम्बराश्चतपलाशकुकुभत्त्वचः ।

वंशसर्जवटानां च कुआर्थमुपसंहरेत् ॥६॥

महुआ, गूरर, पीपल, ढाक, अर्जुन, इनकी छाल, बाँस, सर्ज, बरगद की छाल, इनको कुशा के काम (सिलिन्ट) में बरते।

वि० मन्तव्य—कुशा-भग्न नलकास्थि पर जो लकड़ी की लम्बी फटियाँ धरकर बन्धन किया जाता है उन फटियों का नाम कुशा है। ये फटियाँ महुआदि की मोटी छाल की अथवा उनके काष्ठ की होनी चाहिये अथवा मोटे बाँस की फाड़कर बनाई गई हों। यह सब काष्ठ शीतवीर्य एवं शीतस्पर्श होते हैं, अतः पाक का प्रारम्भ नहीं होने देवे। भग्न स्थान पर कपड़ा

लपेट उसके ऊपर कुशा धरकर बन्धन किया जाता है, (दे० अ० द्व० उ० त० अ० २७) ॥६॥

आलेपनाथं मञ्जिष्ठान्मधुकं रक्तचन्दनम् ।

शतघौतघृतोन्मिश्रं शालिपिष्टं च संहरेत् ॥७॥

मजीठ, मुलेइठी, लालचन्दन, इनको शतघौत घृत में मिलाकर और शाली को पीसकर इनसे लेप करे।

वि० मन्तव्य—यह लेप भी शीतल होने के कारण-पाक को रोकता है ॥७॥

सम्राहादथ सम्राहात् सौम्येष्वतुषु बन्धनम् ।

साधारणेषु कर्तव्यं पञ्चमे पञ्चमेऽहनि ॥८॥

आग्नेयेषु च्यहत् कुर्याद्भ्रनदोषवशेन वा ।

सौम्य ऋतुओं में (शीतकाल हेमन्त में) सात-सात दिन

पीछे पड़ी बाँधे। साधारण ऋतुओं (शरद् ऋतु) में पाँचवें-पाँचवें दिन, आग्नेय ऋतु (ग्रीष्म) में तीसरे दिन पड़ी को बदले अथवा भग्न दोष में दोष के अनुसार जब ठीक समझे तब बदल दे ॥८॥

तत्रातिशिथिलं बद्धे सन्धिरयेयं न जायते ॥९॥

गाढेनापि स्वगादीनां शोको रूक् पाक एव च ।

तस्मात् साधारणं बन्धं भग्ने अंसन्ति तद्विदः ॥१०॥

पट्टी को बहुत ढीला बाँधने से सन्धि स्थिर नहीं होती। कसकर बाँधने से ख्वा आदि में सूजन, वेदना और पाक होता है। इसलिये भग्न से साधारण बन्धन (न ढीला न कसा) उत्तम है।

वि० मन्तव्य—सन्धि टूटी अस्थि का सन्धान स्थिर नहीं होता उचित सन्धान नहीं होता—टेढ़ा मेढ़ा सन्धान हो जाता है और वह अवयव सदा के लिये टेढ़ा हो जाता है ॥९,१०॥

न्यग्रोधादिकषायं तु सुशीतं परिषेचने ।

पञ्चमूलौविपक्वं तु क्षीरं कुर्यात् सवेदेन ॥११॥

परिषेचन कार्य में न्यग्रोधादिगण का कषाय बरते। वेदना होने पर बृहत्पञ्चमूल से पकाया दूध बरते ॥११॥

मुखोष्णमवचार्यं वा चक्रतैलं विजानता ।

अथवा जाननेवाला वैद्य सुहाता गरम चक्रतैल बरते। (चक्रतैल-कोल्हू से ताजा निकला तेल)।

विभज्य कालं दोषं च दोषघ्नोपधसंगुतम् ॥१२॥

परिषेकं प्रदेहं च विवध्याच्छीतमेव च ।

दोष और काल की विवेचना करके दोषनाशक औषधियों से युक्त—मिश्रित परिषेक या प्रदेह शीतल हो करे।

वि० मन्तव्य—भग्न स्थान पर परिषेचन तथा प्रदेह (लेप) शीतल ही करना चाहिये। उष्ण से पाक का प्रारम्भ हो सकता है और पाक का प्रारम्भ हो जाने पर एक नई विपत्ति खड़ी हो जाती है। देखिये इसी अध्याय का ६६ वाँ श्लोक ॥